नागपुर: नागपुर ग्रामीण क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) में पिछले कुछ वर्षों के दौरान चोरी के वाहनों की अवैध पंजीकरण प्रक्रिया का एक बड़ा रैकेट सामने आया है। प्रारंभिक जांच में करीब 1,587 वाहनों की संदिग्ध नोंदणी का मामला उजागर हुआ है, जिनमें से अब तक 462 वाहनों के रजिस्ट्रेशन रद्द किए जा चुके हैं। इस पूरे मामले ने परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
होमोलेगेशन से पहले की खामियों का उठाया गया फायदा
आरटीओ अधिकारी विजय चव्हाण के अनुसार, होमोलेगेशन प्रणाली लागू होने से पहले वाहन पंजीकरण प्रक्रिया में कई तकनीकी खामियां थीं। अपराधियों ने इन खामियों का फायदा उठाते हुए चोरी के वाहनों के चेसिस और इंजन नंबर बदलकर उन्हें अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड जैसे राज्यों में पंजीकृत किया और बाद में अन्य राज्यों में बेच दिया। इस तरह चोरी की गाड़ियों को पूरी तरह वैध रूप दे दिया जाता था।
2023 से शुरू हुई जांच, आंकड़े बढ़कर पहुंचे 1,587 तक
आरटीओ द्वारा 2023 से चोरी के ट्रकों की जांच शुरू की गई थी। शुरुआत में यह संख्या केवल 50 से 100 वाहनों तक सीमित मानी जा रही थी, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, यह आंकड़ा बढ़कर 1,587 संदिग्ध वाहनों तक पहुंच गया। इनमें 1,401 व्यावसायिक (कमर्शियल) और 186 गैर-व्यावसायिक (नॉन-ट्रांसपोर्ट) वाहन शामिल होने की आशंका है।
अब तक 462 वाहन रजिस्ट्रेशन रद्द, कई थानों में केस दर्ज
अब तक कुल 462 वाहनों के पंजीकरण रद्द किए जा चुके हैं। इस मामले में पांच पुलिस थानों में एफआईआर दर्ज की गई है। प्रमुख रूप से:
- गिट्टीखदान थाना (नागपुर): 362 मामले
- काशीमीरा थाना (मिरा-भाईंदर): 91 मामले
- मूलचेरा थाना (गडचिरोली): 5 मामले
- कपिलनगर थाना (नागपुर): 4 मामले
इन मामलों में दलालों और संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।
मैन्युअल सिस्टम के कारण बढ़ी अनियमितताएं
अधिकारी चव्हाण ने बताया कि 2012 से 2017 के बीच पंजीकृत वाहनों में इस प्रकार की गड़बड़ियां अधिक पाई गई हैं। उस समय ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन सिस्टम उपलब्ध नहीं था और पूरी प्रक्रिया मैन्युअल तरीके से होती थी। कई राज्यों में बिना वाहन की भौतिक जांच के केवल दस्तावेजों के आधार पर पंजीकरण कर दिया जाता था, जिससे फर्जीवाड़ा आसान हो गया।
मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी से खुल सकते हैं बड़े राज
आरटीओ द्वारा अब संदिग्ध वाहनों की जानकारी संबंधित वाहन निर्माता कंपनियों से मंगवाई जा रही है और असली पहचान की पुष्टि की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि यदि इस रैकेट के मुख्य मास्टरमाइंड को गिरफ्तार किया जाता है, तो चोरी के वाहनों की खरीद-बिक्री और फर्जी पंजीकरण की पूरी चेन का पर्दाफाश हो सकता है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि तकनीकी खामियां और निगरानी की कमी किस तरह बड़े स्तर पर अपराध को जन्म दे सकती हैं।

