पाणंद सड़क समितियों पर ‘राजनीतिक संतुलन’: विधानसभा से वंचित नेताओं को मिली सह-अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी

नागपुर: राज्य सरकार की ‘मुख्यमंत्री बळीराजा शेत, पाणंद रस्ते योजना’ को प्रभावी बनाने के उद्देश्य से गठित विधानसभा स्तरीय समितियों में सह-अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर राजनीतिक समीकरण साधने की चर्चा तेज हो गई है। जिन नेताओं को विधानसभा चुनाव में अवसर नहीं मिला, उन्हें इन समितियों में स्थान देकर राजनीतिक संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है।

सह-अध्यक्ष पद पर नियुक्तियां और राजनीतिक समीकरण

  • राज्य के 91 विधानसभा क्षेत्रों में सह-अध्यक्षों की नियुक्ति की गई है
  • इन समितियों के अध्यक्ष संबंधित विधायक (MLA) होते हैं
  • सह-अध्यक्ष की नियुक्ति का अधिकार महसूल मंत्री को दिया गया था
  • चयन में ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दी गई:
    • पूर्व विधायक
    • प्रबल दावेदार
    • पार्टी के विश्वसनीय नेता
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नागपुर क्षेत्र के प्रमुख नाम

इस नियुक्ति में नागपुर जिले के कई प्रमुख नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है:

  • टेकचंद सावरकर (कामठी)
  • राजू पारवे (उमरेड)
  • मनोहर कुंभारे (सावनेर)

इन तीनों नेताओं को पहले विधानसभा चुनाव में टिकट या मौका नहीं मिल पाया था, जिसके चलते अब उन्हें पाणंद सड़क समिति के सह-अध्यक्ष पद से संतुलित किया गया है।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और निर्णय

  • कामठी में टेकचंद सावरकर की जगह चंद्रशेखर बावनकुळे चुनाव मैदान में उतरे थे
  • उमरेड में राजू पारवे के बजाय सुधीर पारवे को मौका मिला
  • सावनेर में मनोहर कुंभारे मजबूत दावेदार थे, लेकिन उन्हें आशीष देशमुख के लिए पीछे हटना पड़ा

इन परिस्थितियों के चलते इन नेताओं को अब संगठनात्मक भूमिका देकर संतुलन साधा गया है

अन्य नियुक्तियां भी चर्चा में

  • काटोल क्षेत्र में सतीश रेवतकर, जो पालकमंत्री के करीबी माने जाते हैं, को भी जिम्मेदारी दी गई
  • इससे यह संकेत मिलता है कि विश्वास और नजदीकी भी चयन का अहम आधार रहे हैं

योजना में बजट और सह-अध्यक्षों की भूमिका

  • पहले पाणंद सड़कों के लिए जिला नियोजन समिति से फंड दिया जाता था
  • नागपुर जिले में कुछ क्षेत्रों को 7 करोड़ रुपये तक का फंड मिला था
  • अब राज्य सरकार इस योजना के लिए सीधे बजट में प्रावधान करने की तैयारी में है
  • साथ ही, सह-अध्यक्षों की सिफारिशों को भी महत्व दिया जाएगा
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निष्कर्ष

पाणंद सड़क योजना के तहत की गई ये नियुक्तियां केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि स्पष्ट रूप से राजनीतिक संतुलन का हिस्सा मानी जा रही हैं। इससे एक ओर विकास कार्यों को गति मिलने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक समीकरण साधने की रणनीति भी साफ नजर आ रही है।

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