कोटोडी-एरणगांव के युवाओं पर कोयला खदानों का संकट जमीन गई, नौकरी अटकी और अब शादी भी मुश्किल

नागपुर: कोयला खदानों के लिए जमीन अधिग्रहण ने कोटोडी और एरणगांव के सैकड़ों परिवारों की जिंदगी बदल दी है। जमीन का मुआवजा मिलने के बावजूद ग्रामीणों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल रोजगार और पुनर्वास का है। हालात ऐसे हैं कि जिन युवाओं की जमीन चली गई और नौकरी नहीं मिली, उनके विवाह में भी अड़चनें आने लगी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि खेती का आधार खत्म होने के बाद रोजगार के बिना परिवारों का भविष्य अधर में लटक गया है।

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389 किसानों की जमीन गई, सैकड़ों परिवार प्रभावित

कोटोडी, एरणगांव, पंधराखेड़ा और पटकाखेड़ी गांवों की जमीन अदासा कोयला खदान के लिए अधिग्रहित की गई। इनमें कोटोडी और एरणगांव सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। दोनों गांवों की कुल आबादी करीब 1,400 है, जबकि 389 किसानों की जमीन खदान में चली गई है।

नौकरी का आश्वासन, लेकिन 229 लोग अब भी इंतजार में

ग्रामीणों के अनुसार, आंदोलन के बाद प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति को नौकरी देने का आश्वासन दिया गया था। पहले 131 और बाद में 98 लोगों को नौकरी मिली, लेकिन अभी भी 229 लोग नौकरी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ग्रामीणों की मांग है कि परिवार के पात्र सदस्यों को रोजगार देने के बाद ही गांव का पुनर्वास किया जाए।

‘न खेती बची, न नौकरी, फिर बेटी कौन देगा?’

जमीन और रोजगार के संकट का असर अब युवाओं के विवाह पर भी पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि न खेती है और न स्थायी नौकरी, जिसके कारण रिश्तेदार भी विवाह के लिए पीछे हट रहे हैं। कई परिवारों के सामने अपने बच्चों के भविष्य और विवाह को लेकर गंभीर चिंता पैदा हो गई है।

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जमीन जाने के बाद युवक ने की आत्महत्या की कोशिश

जमीन का मुआवजा मिले बिना डंपिंग किए जाने के विरोध में 21 वर्षीय जगदीश नंदू कोंगरे ने आत्महत्या का प्रयास किया था। वहीं पटकाखेड़ी के 28 वर्षीय स्वप्निल वसंता चौधरी ने करीब दो वर्ष पहले आत्महत्या कर ली थी। बताया गया कि उनकी दो एकड़ जमीन चली गई थी, लेकिन मुआवजा नहीं मिला था और विवाह भी तय नहीं हो पा रहा था। इन परिस्थितियों को उनके इस कदम से जोड़ा गया।

धूल और असुविधाओं से परेशान होकर महिला ने छोड़ा गांव

कोटोडी गांव की धूल और असुविधाओं से परेशान होकर मंगला वाघमारे अपने परिवार के साथ मायके घोराड, तहसील कलमेश्वर चली गईं। ग्रामीणों का कहना है कि पुनर्वास के लिए कम से कम 5 हेक्टेयर जमीन उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

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12 किलोमीटर दूर पुनर्वास का विरोध

ग्रामीणों के अनुसार, शक्तिनगर में प्रस्तावित पुनर्वास स्थल गांव से करीब 12 किलोमीटर दूर है। यदि गांव की आधी खेती ही बचती है तो इतनी दूरी से खेती करना व्यावहारिक नहीं होगा। ग्रामीणों की मांग है कि पुनर्वास सावनेर-नागपुर मार्ग पर किया जाए और खेतिहर मजदूरों को ठेकेदारी के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराया जाए।

पुनर्वास प्लॉट का आकार बढ़ाने की मांग

प्रस्तावित पुनर्वास में प्रत्येक परिवार को 1,060 वर्गफुट का प्लॉट दिए जाने की बात है। ग्रामीणों का कहना है कि इतने छोटे भूखंड में परिवारों का उचित पुनर्वास संभव नहीं होगा। एरणगांव के सतीश गावंडे ने प्लॉट का आकार बढ़ाकर 1,500 वर्गफुट करने की मांग की है।

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ग्रामीणों की मांग: पहले रोजगार, फिर पुनर्वास

ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि केवल जमीन और मकान का मुआवजा पर्याप्त नहीं है। रोजगार, उचित पुनर्वास, पर्याप्त प्लॉट और स्थायी आजीविका की व्यवस्था किए बिना विस्थापन की प्रक्रिया पूरी नहीं की जानी चाहिए। ग्रामीणों के अनुसार, जमीन के साथ उनकी आजीविका भी चली गई है और अब युवाओं का भविष्य संकट में है।

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