23 सालों से अधूरा ‘मिनी ओलंपिक स्टेडियम’ प्रोजेक्ट, 12 करोड़ की लागत बढ़कर 65 करोड़ तक पहुंची

1998 में शुरू हुआ था महत्वाकांक्षी इनडोर स्टेडियम प्रोजेक्ट

नागपुर के दक्षिण क्षेत्र स्थित उमरेड रोड के हरपुर इलाके में मिनी ओलंपिक इनडोर स्टेडियम का निर्माण कार्य वर्ष 1998 में शुरू किया गया था। उस समय इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 12 करोड़ रुपये थी और इसे खेल सुविधाओं के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना थी।

सात करोड़ खर्च के बाद भी केवल ढांचा तैयार

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2007 तक इस प्रोजेक्ट पर करीब 7.05 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके थे, लेकिन इसके बावजूद केवल स्टेडियम का बाहरी ढांचा (स्ट्रक्चर) ही तैयार हो सका। इसके बाद निर्माण कार्य पूरी तरह ठप हो गया और प्रोजेक्ट अधर में लटक गया।

23 साल से अधर में लटका प्रोजेक्ट

पिछले 23 वर्षों से यह स्टेडियम अधूरा पड़ा हुआ है, और समय के साथ इसकी लागत लगातार बढ़ती चली गई। वर्तमान में इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत लगभग 5 गुना बढ़कर 65.46 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है।

नासुप्र द्वारा सुधारित प्रस्ताव शासन को भेजा गया

नागपुर सुधार प्रन्यास (नासुप्र) ने इस प्रोजेक्ट का संशोधित विकास आराखड़ा तैयार कर 45.96 करोड़ रुपये की मंजूरी और निधि उपलब्ध कराने के लिए 4 अक्टूबर 2023 को शासन को भेजा था। इसके बाद 10 अक्टूबर 2025 को पुनः स्मरण पत्र भी भेजा गया, लेकिन अब तक शासन से मंजूरी नहीं मिली है।

भूमि हस्तांतरण और योजना का इतिहास

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इस खेल परिसर के लिए 9.50 एकड़ भूमि क्रीड़ा व युवा कल्याण संचालनालय को हस्तांतरित की गई थी। बाद में परियोजना को पूरा करने के लिए महाराष्ट्र कामगार कल्याण मंडल के साथ समझौता किया गया था, जिसमें कामगार कल्याण निधि से निर्माण कार्य पूरा करने की योजना थी।

ठेका कंपनी ने किया आंशिक काम, फिर रुका निर्माण

निर्माण कार्य का ठेका यूनिटी इन्फ्रा प्रोजेक्ट लिमिटेड को दिया गया था। कंपनी ने 2007 तक निर्माण कार्य करते हुए केवल ढांचा खड़ा किया, जिसके बाद काम बंद हो गया और परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।

2019 में फिर शुरू हुआ काम, लेकिन अधूरा रह गया

वर्ष 2019 में कामगार मंडल ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए एनएमआरडीए को 10 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए। इसके बाद कुछ आंतरिक विकास कार्य जैसे ग्राउंड लेवलिंग, बैडमिंटन व कैरम एरिया, वॉकिंग ट्रैक और ड्रेनेज सिस्टम का काम पूरा किया गया, लेकिन पर्याप्त फंड न मिलने के कारण काम फिर रुक गया।

कामगारों की राशि पर उठे सवाल

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इस परियोजना के जरिए यह उम्मीद थी कि कामगारों के बच्चों को खेल के बेहतर अवसर मिलेंगे, लेकिन अब तक प्रोजेक्ट अधूरा रहने से इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। लगभग 17.05 करोड़ रुपये कामगार कल्याण निधि से खर्च किए गए, लेकिन प्रोजेक्ट अभी भी अधर में है।

बढ़ती लागत और अधूरी उम्मीदें

मूल 12 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट अब बढ़कर 65.46 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जो मूल अनुमान से कई गुना अधिक है। लंबे समय से अटका यह प्रोजेक्ट प्रशासनिक उदासीनता और फंडिंग की कमी का उदाहरण बन गया है।

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