देश में बच्चों के खिलाफ अपराध के आंकड़े बढ़ा रहे चिंता
भारत में बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराध अब सिर्फ एक सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुके हैं। पिछले कुछ वर्षों में सामने आए आंकड़े यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या मौजूदा कानून ऐसे अपराधों को रोकने के लिए पर्याप्त हैं या अब उन्हें और सख्त बनाने की जरूरत है।
NCRB आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच देशभर में बच्चों के खिलाफ लगभग 8,03,000 अपराध दर्ज किए गए। यह आंकड़ा लगातार बढ़ती असुरक्षा और सामाजिक चुनौती की ओर इशारा करता है।
POCSO मामलों में लगातार बढ़ोतरी
बच्चों के यौन शोषण से जुड़े POCSO Act के तहत भी मामलों में भारी संख्या दर्ज हुई। रिपोर्ट के मुताबिक 2019 से 2024 के बीच करीब 3,48,315 मामले सामने आए।
साल 2023 में बच्चों के खिलाफ कुल अपराधों में लगभग 38 प्रतिशत मामले सिर्फ POCSO से जुड़े थे। इसका मतलब है कि देश में हर दिन औसतन 180 से ज्यादा बच्चों के साथ यौन अपराध दर्ज किए गए।
ज्यादातर मामलों में आरोपी परिचित ही निकले
NCRB रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि अधिकतर मामलों में आरोपी कोई अनजान व्यक्ति नहीं थे। इनमें परिवार के सदस्य, दोस्त, पड़ोसी या अन्य परिचित शामिल पाए गए। यह स्थिति समाज के भीतर बढ़ती असुरक्षा को दर्शाती है।
किशोर अपराध के मामलों में भी बढ़ोतरी
देश में Juvenile Crime यानी किशोर अपराध के मामलों में भी लगातार वृद्धि देखी जा रही है। वर्ष 2023 में 31 हजार से अधिक मामलों में किशोर आरोपी पाए गए। इनमें सबसे ज्यादा संख्या 16 से 18 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों की रही।
16–17 साल के आरोपियों पर उठ रहे सवाल
इसी बढ़ते अपराध के बीच समाज का एक वर्ग अब यह सवाल उठा रहा है कि अगर 16–17 वर्ष के किशोर सोशल मीडिया, टेक्नोलॉजी और कानून की समझ रखते हैं, तो गंभीर अपराध करने पर उन्हें सिर्फ “नाबालिग” कहकर राहत क्यों दी जाए?
कई लोग मांग कर रहे हैं कि हत्या, बलात्कार और अन्य जघन्य अपराधों में शामिल किशोरों के लिए कानून और सख्त होना चाहिए।
विशेषज्ञों की अलग राय
हालांकि मनोवैज्ञानिकों और बाल अधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि हर बच्चा जन्म से अपराधी नहीं होता। गलत संगत, नशे की लत, सोशल मीडिया का प्रभाव, पारिवारिक तनाव, मानसिक दबाव और मार्गदर्शन की कमी कई बच्चों को अपराध की तरफ धकेल देती है।
विशेषज्ञों के अनुसार सिर्फ कठोर सजा समाधान नहीं है, बल्कि बच्चों के सुधार, काउंसलिंग और सही शिक्षा पर भी बराबर ध्यान देने की जरूरत है।
देश के सामने बड़ा सवाल
अब देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है —
क्या 16 साल की उम्र के बाद गंभीर अपराध करने वालों के लिए कानून और सख्त होना चाहिए?
या फिर बच्चों के सुधार और सही मार्गदर्शन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए?
आपकी क्या राय है?
क्या गंभीर अपराध करने वाले किशोरों पर वयस्कों जैसा कानून लागू होना चाहिए, या उन्हें सुधार का एक और मौका मिलना चाहिए?

