डिजिटल अरेस्ट के नाम पर हुई साइबर ठगी के मामले में अतिरिक्त जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, नागपुर ने ICICI बैंक को बड़ा झटका दिया है। आयोग ने बैंक को पीड़ित ग्राहक को ₹5.18 लाख के साथ 8 जून 2023 से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया है। इसके अलावा मानसिक और शारीरिक पीड़ा के लिए ₹25,000 तथा वाद व्यय के रूप में ₹10,000 यानी कुल ₹35,000 का अतिरिक्त मुआवजा देने का भी निर्देश दिया गया है।
विदेशी पार्सल के नाम पर बनाया गया डिजिटल अरेस्ट का शिकार
मामले के अनुसार, सावनेर निवासी और वर्तमान में गुरुग्राम में कार्यरत प्राची दिगंबर ढोके को 8 जनवरी 2023 को फेडेक्स कस्टमर सर्विस के नाम से फोन आया। कॉल करने वालों ने दावा किया कि उनके नाम से भेजे गए पार्सल में दो पासपोर्ट, पांच एटीएम कार्ड, 300 ग्राम मादक पदार्थ और एक लैपटॉप मिला है।
इसके बाद खुद को मुंबई पुलिस का अधिकारी बताकर उन्हें कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया गया और कथित जांच के नाम पर ₹6.13 लाख एक ICICI बैंक खाते में ट्रांसफर करा लिए गए।
शिकायत के बाद भी पूरी रकम वापस नहीं मिली
धोखाधड़ी का पता चलते ही प्राची दिगंबर ढोके ने बैंक और साइबर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद उन्होंने बैंकिंग लोकपाल का भी दरवाजा खटखटाया, जहां उन्हें ठगी गई रकम का केवल 25 प्रतिशत, यानी ₹1.75 लाख ही वापस मिला।
बाकी ₹5.18 लाख की वसूली के लिए उन्होंने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दायर की।
ग्राहक आयोग ने बैंक की लापरवाही मानी
आयोग के अध्यक्ष सतीश सप्रे और सदस्य मिलिंद केदार ने मामले की सुनवाई के बाद शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बैंक को शेष ₹5.18 लाख, उस पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, तथा ₹35,000 मुआवजा देने का आदेश दिया।
इस मामले में पीड़िता की ओर से एडवोकेट महेंद्र लिमये ने पक्ष रखा।
बैंक की लापरवाही पर आयोग की कड़ी टिप्पणी
आयोग ने अपने आदेश में ICICI बैंक की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। जिस खाते में ठगी की रकम भेजी गई, वह एक प्लास्टिक व्यापारी का था, जिसका वार्षिक कारोबार करीब ₹40 लाख था। इसके बावजूद 7 से 9 जनवरी 2023 के बीच उसी खाते में करीब ₹2.84 करोड़ के संदिग्ध लेनदेन हुए, लेकिन बैंक ने कोई निगरानी नहीं की।
आयोग ने कहा कि RBI के दिशा-निर्देशों के अनुसार असामान्य और संदिग्ध लेनदेन पर बैंक की लगातार निगरानी होना आवश्यक है। साथ ही, पीड़िता द्वारा समय रहते बैंक को सूचना देने के बावजूद बैंक एक ही बैंक की अलग-अलग शाखाओं के बीच स्थानांतरित राशि को रोकने में विफल रहा, जो स्पष्ट रूप से लापरवाही को दर्शाता है।

