नागपुर: अपराध जांच में अहम भूमिका निभाने वाली नागपुर पुलिस की डॉग स्क्वॉड यूनिट अब सवालों के घेरे में आ गई है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से सितंबर 2024 के बीच डॉग स्क्वॉड ने दर्जनों घटनास्थलों पर पहुंचने के बावजूद एक भी मामले का खुलासा नहीं किया।
9 महीनों में 73 कॉल पर पहुंची डॉग स्क्वॉड
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, नागपुर शहर में इस अवधि के दौरान कुल 5 डॉग स्क्वॉड यूनिट्स सक्रिय थीं। इन यूनिट्स को नौ महीनों में कुल 73 मामलों में बुलाया गया।
30 मामलों में कुत्तों का इस्तेमाल, फिर भी नहीं मिला सुराग
इन 73 घटनाओं में से 30 मामलों में डॉग स्क्वॉड का सक्रिय रूप से इस्तेमाल किया गया, जबकि 43 मामलों में उनकी जरूरत नहीं पड़ी। हालांकि जिन मामलों में डॉग स्क्वॉड को तैनात किया गया, वहां भी आरोपी की पहचान या किसी ठिकाने तक पहुंचने में सफलता नहीं मिली।
जांच में नहीं मिला कोई ठोस परिणाम
रिपोर्ट के अनुसार, डॉग स्क्वॉड घटनास्थल पर केवल सामान्य दिशा बताने तक सीमित रहा। कुत्ते न तो आरोपियों तक पहुंच पाए और न ही किसी संदिग्ध स्थान की पहचान कर सके। इसके बाद यूनिट की कार्यक्षमता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
हत्या जैसे गंभीर मामलों में भी किया गया इस्तेमाल
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि डॉग स्क्वॉड को हत्या सहित गंभीर अपराधों के मामलों में भी मौके पर भेजा जाता है। पुलिस कंट्रोल रूम से कॉल मिलते ही टीम तत्काल घटनास्थल के लिए रवाना होती है।
पुलिस अधिकारियों ने बताई व्यावहारिक चुनौतियां
डॉग स्क्वॉड यूनिट के प्रभारी पुलिस उपनिरीक्षक नितिन अवधूत ने कहा कि जांच के दौरान कई व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार घटनास्थल पर भीड़, देरी से सूचना मिलना और सबूतों के साथ छेड़छाड़ जैसी वजहों से डॉग स्क्वॉड को सही दिशा में काम करने में कठिनाई होती है।
सिस्टम की कार्यक्षमता पर उठे बड़े सवाल
लगातार बढ़ते अपराधों के बीच डॉग स्क्वॉड की निष्क्रियता ने पुलिस व्यवस्था और जांच प्रणाली की प्रभावशीलता पर बहस छेड़ दी है। अब लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि आधुनिक जांच तंत्र के बावजूद अपराधियों तक पहुंचना इतना मुश्किल क्यों हो रहा है।

