छह साल तक नागरिक के आवेदनों पर नहीं हुआ फैसला
नागपुर खंडपीठ में सरकारी अधिकारियों के कामकाज को लेकर मंगलवार को सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। न्यायालय ने कहा कि सरकारी अधिकारी जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं। मामला नागरिकों के आवेदनों और निवेदनों को वर्षों तक लंबित रखने से जुड़ा है।
2018 से 2023 तक दिए गए थे कई आवेदन
याचिकाकर्ता दिलीप ठाकरे ने अपनी सेवा संबंधी मांग को लेकर अक्टूबर 2018 से नवंबर 2023 के बीच नागपुर संभागीय आयुक्त और जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को कई आवेदन एवं निवेदन दिए थे। आरोप है कि करीब छह साल बीतने के बावजूद इन पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।
समय पर काम नहीं होने से हाईकोर्ट का रुख
न्यायालय ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जब सरकारी अधिकारी समय पर नागरिकों के मामलों का निपटारा नहीं करते, तो लोगों को न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। ऐसी याचिकाओं के कारण न्यायालय का महत्वपूर्ण समय भी खर्च होता है।
ग्राम विकास विभाग के सचिव को भी फटकार
न्यायालय ने 31 अगस्त 2026 को ग्राम विकास विभाग के मुख्य सचिव को मामले की स्वयं जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश दिया था। हालांकि, सचिव ने कथित तौर पर उन्हीं जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को जांच के निर्देश दे दिए, जिनसे संबंधित आरोपों की जांच होनी थी।
इस पर न्यायालय ने सचिव की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई।
6 अक्टूबर तक प्रतिज्ञापत्र दाखिल करने का आदेश
न्यायालय ने ग्राम विकास विभाग के सचिव को यह स्पष्ट करने का आदेश दिया है कि उन्होंने मामले की स्वयं जांच क्यों नहीं की और 31 अगस्त के आदेश का कथित उल्लंघन करते हुए जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को अधीनस्थ कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पत्र क्यों भेजा।
अदालत ने सचिव को 6 अक्टूबर तक प्रतिज्ञापत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
विलंब रोकने वाले कानून के पालन पर सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अश्विन इंगोले ने अदालत को बताया कि सरकारी कामकाज में देरी रोकने के लिए ‘महाराष्ट्र शासकीय कर्मचारियों के तबादलों का विनियमन और शासकीय कार्यों में विलंब की रोकथाम अधिनियम’ मौजूद है। लेकिन दोषी अधिकारियों के खिलाफ संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई नहीं होने से कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठ रहे हैं।

