पति-पत्नी के विवाद का बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर गंभीर असर, आत्मविश्वास में कमी से लेकर नींद और व्यवहार में बदलाव तक की आशंका
नागपुर: बच्चों को जिस घर में प्यार, अपनापन और सुरक्षा मिलनी चाहिए, उसी घर में माता-पिता के बीच होने वाले विवाद उनके बचपन को प्रभावित कर रहे हैं। नागपुर जिले में पारिवारिक विवाद बढ़ने के बीच बच्चों की कस्टडी को लेकर पति-पत्नी के अदालत पहुंचने के मामले भी सामने आ रहे हैं। इन विवादों का बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व विकास पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।
जब पति-पत्नी के बीच मतभेद गहरे हो जाते हैं और मामला तलाक तक पहुंचता है, तब कई बार बच्चों की कस्टडी को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू हो जाती है। इस प्रक्रिया में बच्चों को भावनात्मक तनाव का सामना करना पड़ सकता है।
कस्टडी के लिए फैमिली कोर्ट में पहुंच रहे मामले
पारिवारिक विवादों के बाद बच्चों को अपने पास रखने के अधिकार को लेकर माता-पिता के बीच कानूनी संघर्ष शुरू हो जाता है। नागपुर के परिवार न्यायालय में बच्चों की कस्टडी से जुड़े आवेदन दर्ज किए जा रहे हैं।
समाचार में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में कस्टडी के लिए 56 आवेदन और वर्ष 2025 में 61 आवेदन दाखिल किए गए। वर्ष 2026 के आंकड़े मूल समाचार में स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए उनकी पुष्टि आवश्यक है।
माता-पिता के झगड़े से बच्चों पर पड़ सकता है मानसिक दबाव
बच्चों के लिए परिवार प्रेम और सुरक्षा का आधार होता है। लेकिन जब घर में लगातार झगड़े, तनाव और आपसी विवाद होते हैं, तो इसका असर उनके व्यवहार और भावनात्मक स्थिति पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे माहौल में कुछ बच्चों में निम्नलिखित बदलाव दिखाई दे सकते हैं:
- मानसिक तनाव और निराशा: बच्चे उदास रहने लग सकते हैं या दूसरों से दूरी बना सकते हैं।
- आत्मविश्वास में कमी: कई बार बच्चे माता-पिता के झगड़े के लिए खुद को जिम्मेदार मानने लगते हैं।
- व्यवहार में बदलाव: चिड़चिड़ापन, कम बोलना और भावनाएं व्यक्त करने में कठिनाई जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
- खानपान और नींद पर असर: तनाव के कारण बच्चों की सोने और खाने की आदतें प्रभावित हो सकती हैं।
- भविष्य के रिश्तों पर प्रभाव: लंबे समय तक पारिवारिक विवाद देखने वाले बच्चों के मन में विवाह और रिश्तों को लेकर अविश्वास पैदा हो सकता है।
बच्चों के स्वास्थ्य और विकास पर भी असर
लगातार मानसिक तनाव बच्चों की दिनचर्या और समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। ऐसे माहौल में उनकी पढ़ाई, सामाजिक संबंधों और भावनात्मक विकास पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।
इसलिए माता-पिता के लिए जरूरी है कि वे अपने विवादों के बीच बच्चों को न घसीटें और उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने से बचें। बच्चों को यह महसूस कराना महत्वपूर्ण है कि माता-पिता के बीच मतभेद होने के बावजूद वे उनके लिए जिम्मेदार और देखभाल करने वाले बने रहेंगे।
अदालत में बच्चे का हित सर्वोपरि
उच्च न्यायालय के अधिवक्ता अनुप ढोरे के अनुसार, बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में न्यायालय का प्रमुख सिद्धांत ‘बच्चे का हित सर्वोपरि’ होता है। हालांकि, कानूनी लड़ाई लंबी खिंचने पर बच्चों को भावनात्मक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि माता-पिता को आपसी विवादों में अपनी भावनाओं और अहंकार से ऊपर उठकर बच्चों के भविष्य पर ध्यान देना चाहिए। पारिवारिक परामर्श और आपसी संवाद के माध्यम से विवाद सुलझाने का प्रयास करना समय की जरूरत है।
बच्चों का बचपन बचाने के लिए संवाद जरूरी
तलाक या कस्टडी विवाद के दौरान बच्चों को माता-पिता के संघर्ष का माध्यम नहीं बनाना चाहिए। उन्हें सुरक्षित माहौल, भावनात्मक सहारा और दोनों अभिभावकों के साथ स्वस्थ संबंध बनाए रखने का अवसर मिलना चाहिए, बशर्ते ऐसा करना उनके हित और सुरक्षा के अनुकूल हो।
माता-पिता के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उसका बोझ बच्चों पर नहीं पड़ना चाहिए। समय रहते संवाद, पारिवारिक समुपदेशन और बच्चे की जरूरतों को प्राथमिकता देना उनके भविष्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

