भिवापुर: महाराष्ट्र के नागपुर जिले की भिवापुर तहसील में कपास की फसल पर लाल्या रोग का प्रकोप बढ़ने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। कपास की पहली तुड़ाई शुरू होने से पहले ही भगवानपुर सहित तहसील के अधिकांश खेतों में पौधों की पत्तियां लाल पड़ने लगी हैं। लंबे समय तक बारिश नहीं होने, फसल पर पानी के तनाव और मैग्नीशियम व बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को इसकी प्रमुख वजह बताया जा रहा है। इसका असर कपास के उत्पादन पर पड़ने की आशंका है। दूसरी ओर, प्रतिकूल मौसम और येलो मोजेक रोग के कारण सोयाबीन की फसल को भी नुकसान पहुंचा है।
16,500 हेक्टेयर में कपास की खेती, पिछले साल से 18 प्रतिशत अधिक क्षेत्र
इस वर्ष भिवापुर तहसील में लगभग 16,500 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई की गई है। पिछले वर्ष की तुलना में कपास का रकबा करीब 18 प्रतिशत बढ़ा है। हालांकि, बारिश की अनियमितता, लंबे अंतराल और पानी की कमी के कारण फसल की अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी है। फिलहाल कपास के पौधे फूल आने और फल बनने की अवस्था में हैं, लेकिन इसी दौरान पत्तियां लाल पड़ने से किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
पहली तुड़ाई से पहले ही सूखने लगी फसल
कपास के पौधों पर अभी पत्तियां, कलियां और फूल मौजूद हैं। कुछ पौधों में बोंड पकने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है, लेकिन कई खेतों में पत्तियां लाल होकर सूखने लगी हैं। प्रतिकूल मौसम के कारण कुछ क्षेत्रों में कपास के बोंड गिरने की समस्या भी सामने आई है। हल्की मिट्टी वाले खेतों में फसल की स्थिति अधिक खराब बताई जा रही है, जबकि मध्यम और भारी काली मिट्टी में लगी फसल कुछ हद तक स्थिति का सामना कर रही है। सबसे अधिक परेशानी बारिश पर निर्भर यानी असिंचित खेती करने वाले किसानों को हो रही है।
मैग्नीशियम और बोरॉन की कमी से पत्तियां हो रही हैं लाल
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, बारिश में लंबे अंतराल और मैग्नीशियम व बोरॉन की कमी के कारण कपास के पौधों में हरितद्रव्य प्रभावित होता है। इससे पत्तियां लाल पड़ने लगती हैं और पौधे समय से पहले सूख सकते हैं। फूल और कलियां गिरने से उत्पादन पर भी असर पड़ने की आशंका है। कुछ खेतों में रस चूसने वाले कीटों, माहू और तुडतुडों का प्रकोप भी देखा गया है।
फसल बचाने के लिए हल्की सिंचाई और कीट नियंत्रण की सलाह
कृषि विशेषज्ञों ने फसल की स्थिति को देखते हुए आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करने और पोषक तत्वों की कमी का आकलन कर उचित उपाय अपनाने की सलाह दी है। प्रभावित खेतों में कीटों का समय रहते प्रबंधन करना भी जरूरी बताया गया है। भिवापुर की तालुका कृषि अधिकारी सुप्रिया कोकणी के अनुसार, मैग्नीशियम और बोरॉन की कमी के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है। उन्होंने बताया कि पत्तियों के लाल पड़ने और फूल-कली गिरने से कपास का उत्पादन घट सकता है। उनके अनुसार, उचित पोषण प्रबंधन और सिंचाई से फसल को राहत मिल सकती है।
किसानों की चिंता बढ़ी, एक एकड़ में 1 से 2 क्विंटल उत्पादन का अनुमान
भगवानपुर के सरपंच एवं किसान हरिश्चंद्र चौधरी ने फसल की खराब स्थिति पर चिंता जताई है। उनके अनुसार, कपास की अब तक एक भी तुड़ाई नहीं हुई है, लेकिन लाल्या रोग के कारण पौधे सूखने लगे हैं। उन्होंने आशंका जताई कि मौजूदा हालात में एक एकड़ में मुश्किल से 1 से 2 क्विंटल कपास ही मिल पाएगा। यदि उत्पादन में इतनी गिरावट आती है, तो किसानों की आमदनी पर गंभीर असर पड़ सकता है।
येलो मोजेक से सोयाबीन की फसल को भी नुकसान
भिवापुर तहसील में कपास के साथ सोयाबीन भी प्रमुख नकदी फसल है। कम लागत और दिवाली से पहले फसल मिलने की उम्मीद के कारण बड़ी संख्या में किसान इसकी खेती करते हैं। हालांकि, इस वर्ष बारिश में लंबे अंतराल, प्रतिकूल मौसम और येलो मोजेक रोग के कारण सोयाबीन की फसल भी प्रभावित हुई है। कपास और सोयाबीन, दोनों फसलों को नुकसान की आशंका से किसान आर्थिक संकट को लेकर चिंतित हैं।
कृषि संकट के बीच किसानों को राहत का इंतजार
भिवापुर तहसील के कई किसान पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में कपास और सोयाबीन की फसल प्रभावित होने से उनकी परेशानी और बढ़ गई है। किसानों के सामने अब फसल को बचाने, उत्पादन में संभावित गिरावट से निपटने और आर्थिक नुकसान की भरपाई की चुनौती है। प्रभावित क्षेत्रों में फसल की स्थिति का आकलन और समय पर कृषि मार्गदर्शन किसानों के लिए महत्वपूर्ण होगा।

