आज हम बात करेंगे की कैसे स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की आवाज़ को नज़रअंदाज़ करने का नतीजा एक बड़े राजनीतिक उलटफेर के रूप में सामने आया।
हम कहानी शुरू करते हैं 2017 से, जब कांद्री ग्राम पंचायत के चुनाव में भाजपा ने वरिष्ठ नेताओं के फैसले पर जाकर एक ऐसे उम्मीदवार को टिकट दिया, जिसे स्थानीय कार्यकर्ताओं ने सही नहीं माना था। जब अनसुनी हुई, तो परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस के खेमे में गए बलवन्त पड़ोले सरपंच बन गए और भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।
तीन साल बाद, 2019-20 के जिला परिषद चुनाव में फिर वही गलती दोहराई गई। स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद भाजपा ने शालिनी बर्वे को टिकट दिया और कांग्रेस ने रश्मी बर्वे को उतारा। नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस की रश्मी बर्वे ने जीत दर्ज की और जिला परिषद अध्यक्ष बनीं।
अब 2024 के लोकसभा चुनाव में वही पूर्व उपसरपंच श्याम कुमार उर्फ बब्लू बर्वे कांग्रेस के उम्मीदवार बने और लोकसभा सीट भी जीत गए। इस तरह भाजपा के गलत फैसलों ने कांग्रेस को यहाँ ज़ीरो से हीरो बनाने में मदद की।
यह एक सबक है कि अगर भाजपा अपने ज़मीनी कार्यकर्ताओं की बातों को अनसुना करती रहेगी, तो न सिर्फ उसे चुनावी हार का सामना करना पड़ेगा, बल्कि उसी का नुकसान उठाकर विरोधी दल मज़बूत होते जाएंगे। अब सवाल यह उठता है कि क्या आने वाले चुनावों में भाजपा यह सबक लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं की आवाज़ को महत्व देगी या फिर इतिहास खुद को दोहराएगा?

