नागपुर में ‘वजनदार’ भाजपा पार्षदों के वार्डों में ही विकास का अमृत कलश? 45 करोड़ के खेल बजट पर उठे सवाल

200 खेल मैदान विकसित करने का लक्ष्य

नागपुर महानगरपालिका ने शहर में 200 खेल मैदानों के विकास का लक्ष्य रखा है। अमृत महोत्सवी वर्ष के तहत 75 उद्यानों और 75 खेल मैदानों के कायाकल्प का दावा किया जा रहा है। हालांकि, योजना के पहले चरण में ही मैदानों के चयन को लेकर पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

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पहले चरण में 10 मैदानों का चयन

पहले चरण में जिन खेल मैदानों के विकास की योजना है, उनमें बिरसानगर मैदान, चक्रधर नगर मैदान, पांडे ले-आउट मैदान, बाबुलबन सुगत बुद्ध विहार मैदान, आकांक्षा सोसायटी दाभा, वाठोडा गांव मैदान, सहकार नगर मैदान, रमाबाई आंबेडकर मैदान, पाहुणे ले-आउट मैदान और मरारटोली मैदान शामिल हैं।

अधिकतर मैदान ‘वजनदार’ नेताओं के वार्डों में

चयनित मैदानों को लेकर आरोप है कि इनमें से अधिकांश महापौर, स्थायी समिति सभापति, सत्तापक्ष नेता और विभिन्न विषय समितियों के सभापतियों के वार्डों में स्थित हैं। इनमें भाजपा के कई प्रभावशाली पदाधिकारियों के वार्ड शामिल बताए जा रहे हैं। मुस्लिम लीग के असलम मुल्ला का वार्ड इस मामले में अपवाद बताया गया है।

जरूरतमंद मैदानों की अनदेखी का आरोप

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स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि मैदानों का चयन वास्तविक जरूरत, खराब स्थिति और खिलाड़ियों की मांग के आधार पर होना चाहिए था। आरोप है कि इन मानकों को दरकिनार कर राजनीतिक प्रभाव वाले वार्डों को प्राथमिकता दी गई।

सदर के मैदान को नहीं मिली जगह

प्रभाग 14 के सदर क्षेत्र के खराब स्थिति वाले खेल मैदान को पहले चरण में शामिल नहीं किए जाने से चयन प्रक्रिया पर सवाल और गहरा गए हैं। क्षेत्र में खेल सुविधाओं की जरूरत के बावजूद मैदान को सूची से बाहर रखने को लेकर भेदभाव के आरोप लगाए जा रहे हैं।

45 करोड़ के खेल बजट पर भी सवाल

मनपा के बजट में खेल विकास के लिए 45 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। हालांकि, चर्चा है कि इस राशि का बड़ा हिस्सा प्रभावशाली नगरसेवकों और आजी-माजी पदाधिकारियों द्वारा आयोजित सांस्कृतिक महोत्सवों के नाम पर खर्च किया जा सकता है। इससे खेल विकास का वास्तविक उद्देश्य पीछे छूटने की आशंका जताई जा रही है।

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राजनीतिक सुविधा या वास्तविक खेल विकास?

खेल मैदानों के चयन ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि मनपा का ‘अमृत कलश’ वास्तव में शहर के खिलाड़ियों और नागरिकों के लिए है या प्रभावशाली राजनीतिक क्षेत्रों के विकास तक सीमित है। अब मैदानों के चयन के मानदंड और 45 करोड़ रुपये के बजट के उपयोग को लेकर पारदर्शिता की मांग उठ रही है।

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