खतरनाक कामों में झोंके जा रहे मासूम, बचाव के बाद भी न्याय अधूरा
नागपुर में बाल तस्करी और बाल मजदूरी का गंभीर मुद्दा एक बार फिर सवालों के घेरे में है। समय-समय पर प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई में खतरनाक परिस्थितियों में काम कर रहे बच्चों को मुक्त कराया जाता है, लेकिन इस अवैध कारोबार के पीछे सक्रिय मुख्य आरोपियों और तस्करी के सूत्रधारों तक जांच नहीं पहुंच पाने पर सवाल उठ रहे हैं। बच्चों को बचाने के बाद उनके शोषण के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ ठोस कार्रवाई और सजा की स्थिति भी स्पष्ट रूप से सामने नहीं आती।
घर से दूर, अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर बच्चे
बाल मजदूरी में फंसे बच्चों को उनके घर, परिवार और सुरक्षित माहौल से दूर लाकर खतरनाक तथा भारी कामों में लगाया जाता है। रहने के नाम पर कई बच्चों को छोटी और दमघोंटू जगहों में एक साथ रखा जाता है। काम के घंटे, सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के नियमों की अनदेखी होने से उनके जीवन और भविष्य पर गंभीर असर पड़ता है। बीमारी की स्थिति में उपचार की व्यवस्था भी अनिश्चित रहती है। यह स्थिति बाल अधिकारों और मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन को उजागर करती है।
गांधीबाग से बूटीबोरी तक कार्रवाई, लेकिन सरगनाओं पर सवाल
गांधीबाग, तहसील, बूटीबोरी और वाड़ी की कंपनियों सहित विभिन्न स्थानों पर बाल मजदूरी के मामलों में कार्रवाई होती रही है। हालांकि, इन कार्रवाइयों के बाद जांच की कड़ी कथित तौर पर उन लोगों तक नहीं पहुंच पाती, जो बच्चों को काम पर लगाने और उनकी तस्करी के नेटवर्क को संचालित करते हैं।
ऐसे मामलों में बच्चों को मुक्त कराने और दस्तावेजी कार्रवाई तक सीमित रहने के बजाय यह पता लगाना जरूरी है कि उन्हें कहां से लाया गया, किसने काम पर लगाया और इस पूरे नेटवर्क में किन लोगों की भूमिका है। मुख्य आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई का अभाव बाल तस्करी पर प्रभावी रोक लगाने की कोशिशों को कमजोर कर सकता है।
एनसीपीसीआर का देशव्यापी अभियान, नागपुर में कार्रवाई पर सवाल
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने 12 जून से 31 अगस्त 2026 तक देशभर में विशेष ‘पैन इंडिया रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन कैंपेन’ चलाया था। इस अभियान के तहत जिलाधिकारियों, श्रम विभाग, पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियों से बचाव अभियानों, एफआईआर, बच्चों के पुनर्वास तथा उनकी शिक्षा में दोबारा शामिल किए जाने से संबंधित नियमित जानकारी मांगी गई थी।
सरकार ने 4 सितंबर को बताया था कि इस अभियान के दौरान देशभर में 3,800 से अधिक बच्चों को मुक्त कराया गया और 575 से अधिक एफआईआर दर्ज की गईं। इसके बावजूद नागपुर सहित विदर्भ में कार्रवाई के प्रभाव और बाल तस्करी के पीछे सक्रिय लोगों के खिलाफ उठाए गए कदमों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। संबंधित विभागों के बीच समन्वय की कमी भी एक संभावित कारण के रूप में सामने आती है।
कानून में कठोर सजा, लेकिन अमल कितना प्रभावी?
बाल तस्करी और बाल मजदूरी के खिलाफ कानून में आर्थिक दंड से लेकर गंभीर मामलों में लंबी अवधि की कैद तक के प्रावधान हैं। कुछ अपराधों में सजा 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक हो सकती है। इसके बावजूद यदि दोषियों की पहचान, जांच और अभियोजन प्रभावी ढंग से नहीं होता, तो कानून का डर कमजोर पड़ सकता है।
सवाल यह है कि बच्चों को मुक्त कराने के बाद उनके शोषण के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उन्हें सजा दिलाने की प्रक्रिया कितनी आगे बढ़ती है। केवल छापेमारी और बचाव अभियान पर्याप्त नहीं हैं; तस्करी के पूरे नेटवर्क की जांच, जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई और बच्चों का पुनर्वास भी उतना ही जरूरी है।
एक साल में 57 बच्चों को कराया गया मुक्त
नागपुर के जिला बाल संरक्षण अधिकारी मुस्ताक पठाण के अनुसार, वर्षभर में विभिन्न स्थानों पर की गई कार्रवाइयों के दौरान 57 बच्चों को मुक्त कराया गया। इन मामलों में बच्चों से खतरनाक जगहों पर काम करवाए जाने की बात सामने आई थी।
बच्चों को मुक्त कराना महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसके साथ ही उन्हें सुरक्षित वातावरण, शिक्षा और आवश्यक पुनर्वास उपलब्ध कराना भी जरूरी है। बाल तस्करी पर स्थायी रोक लगाने के लिए प्रशासन, पुलिस, श्रम विभाग और बाल कल्याण से जुड़ी संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय तथा अपराध के पीछे सक्रिय सूत्रधारों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है।

