नागपुर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IIIT) में छात्र श्रेयस माने की आत्महत्या की घटना ने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि सुबह करीब 4 बजे नौवीं मंजिल से कूदने के बाद भी प्रशासन की ओर से तुरंत कार्रवाई नहीं की गई, जो बेहद चौंकाने वाली बात है। संस्था खुद को विश्वस्तरीय सुविधाओं वाली बताती है, लेकिन हकीकत में यहां आपातकालीन मेडिकल सुविधा और एम्बुलेंस तक मौजूद नहीं है। नागपुर शहर से करीब 22 किलोमीटर दूर स्थित इस कैंपस में बुनियादी सुविधाओं की कमी ने छात्रों के गुस्से को और बढ़ा दिया है। घटना के बाद सैकड़ों छात्र प्रशासनिक भवन के सामने जमा हुए और जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया।
उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ते मौत के मामले चिंता का विषय
इस साल अलग-अलग उच्च शिक्षण संस्थानों में चार छात्रों की मौत हो चुकी है। कुछ दिन पहले महाराष्ट्र लॉ यूनिवर्सिटी में दो छात्रों की दुर्घटना में मौत हुई थी, वहीं कुछ महीने पहले एम्स में एक महिला डॉक्टर ने आत्महत्या कर ली थी। ऐसे मामलों को अक्सर मानसिक तनाव का कारण बताकर खत्म कर दिया जाता है, लेकिन गहराई से जांच नहीं होती। प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई करना जहां छात्रों का सपना होता है, वहीं ऐसी घटनाएं परिवार के लिए जिंदगी भर का दर्द बन जाती हैं।
परीक्षाएं स्थगित, जांच के लिए समिति गठित
घटना की जानकारी मिलने के बाद प्रभारी निदेशक प्रो. प्रेम लाल पटेल देर से संस्थान पहुंचे, जिससे छात्रों में नाराजगी और बढ़ गई। हालात को देखते हुए प्रशासन ने परीक्षाएं दो दिनों के लिए स्थगित कर दी हैं। साथ ही पूरे मामले की जांच के लिए एक विशेष समिति का गठन किया गया है।
श्रेयस को काउंसलिंग की थी जरूरत
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि श्रेयस सेमेस्टर परीक्षा के दबाव में था और उसकी पढ़ाई पूरी नहीं हुई थी। वह कई दिनों से कॉलेज भी नहीं जा रहा था। ऐसे में अगर समय रहते काउंसलिंग की जाती, तो उसका मानसिक तनाव कम किया जा सकता था। यूजीसी ने पहले ही छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए काउंसलिंग सेंटर अनिवार्य करने के निर्देश दिए हैं, लेकिन यहां ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी। सवाल यह भी उठता है कि छात्र की लगातार अनुपस्थिति को प्रोफेसरों ने गंभीरता से क्यों नहीं लिया।
यह पूरी घटना सिर्फ एक छात्र की मौत नहीं है, बल्कि शिक्षा संस्थानों में प्रबंधन की लापरवाही, संवेदनहीनता और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति उदासीनता को उजागर करती है।

