145 साल की परंपरा में इस बार फीकी पड़ी बडगों की धार, सत्ता से सवाल पूछने वाला नागपुर का तेवर गायब

नागपुर: ‘लेकर जाओ गे मारबत’ के जयघोष के साथ नागपुर की 145 वर्ष पुरानी मारबत-बडगा परंपरा इस बार भी उत्साह के साथ मनाई गई। काली और पीली मारबत के साथ विभिन्न रंगों की मारबतें भी मिरवणूक में शामिल हुईं। हालांकि, इस ऐतिहासिक परंपरा की खास पहचान रहे सत्ता पर व्यंग्यात्मक प्रहार करने वाले बडगे इस बार अपेक्षाकृत फीके नजर आए।

महंगाई, आरक्षण और बेरोजगारी जैसे मुद्दे रहे पीछे

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पिछले एक वर्ष में चर्चा में रहे महंगाई, आरक्षण, बेरोजगारी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के कारण रोजगार का संकट, शहर की खराब सड़कें और मच्छरों का प्रकोप जैसे स्थानीय एवं सामाजिक मुद्दों की अपेक्षित झलक बडगों में दिखाई नहीं दी। इसके चलते इस बार मारबत-बडगा उत्सव का राजनीतिक और सामाजिक संदेश पहले की तुलना में कमजोर नजर आया।

पाकिस्तान, आतंकवाद और स्मार्ट मीटर का विरोध प्रमुख

इस बार बडगों में पाकिस्तान, आतंकवाद और स्मार्ट मीटर के विरोध से जुड़े संदेश अधिक प्रमुख रहे। विदर्भ क्रांति दल का महंगाई विरोधी बडगा, छत्तीसगढ़ समाज बडगा उत्सव मंडल का स्मार्ट मीटर विरोधी बडगा तथा छत्रपति शिवाजी महाराज बडगा उत्सव समिति का पाकिस्तान विरोधी बडगा मिरवणूक में शामिल रहा।

सत्ता पर व्यंग्य का पारंपरिक तेवर हुआ कमजोर

मारबत-बडगा उत्सव की पहचान ही अन्याय, भ्रष्टाचार, महंगाई और सरकार की नीतियों के खिलाफ व्यंग्यात्मक तरीके से आवाज उठाने की रही है। अंग्रेजी शासन के दौर से चली आ रही इस परंपरा में बडगों के माध्यम से सत्ता से सवाल पूछे जाते रहे हैं। इस बार हालांकि वर्षभर चर्चा में रहे कई महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपेक्षित तीखापन नजर नहीं आया।

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टीईटी घोटाले और मराठा आरक्षण आंदोलन की भी रही कमी

देश और महाराष्ट्र में चर्चा में रहे इथेनॉल नीति, पेट्रोल-डीजल की कीमतें, महंगाई, शेयर बाजार की अस्थिरता, टीईटी घोटाला, मराठा आरक्षण और जरांगे-पाटील आंदोलन जैसे मुद्दों की भी बडगों में खास छाप दिखाई नहीं दी। वहीं एआई के कारण शिक्षा और रोजगार के सामने खड़ी चुनौतियों पर भी अपेक्षित राजनीतिक व्यंग्य नजर नहीं आया।

नागपुर के स्थानीय मुद्दे भी नहीं बन सके प्रमुख संदेश

नागपुर शहर में नागरिकों को परेशान करने वाले सड़कों के गड्ढे, मच्छरों का बढ़ता प्रकोप और यातायात की समस्या जैसे स्थानीय मुद्दे भी इस बार बडगों के माध्यम से प्रभावी ढंग से सामने नहीं आए। इससे जनता से जुड़े कई अहम सवाल मिरवणूक के राजनीतिक-सामाजिक संदेश से दूर रहे।

विभिन्न रंगों की मारबतों ने खींचा ध्यान

काली और पीली मारबत इस परंपरा की प्रमुख पहचान हैं, लेकिन इस बार चांदी, लाल, हरे, पीले और भूरे रंग की मारबतें भी मिरवणूक में शामिल हुईं। काली और पीली मारबत की छोटी प्रतिकृतियां भी आकर्षण का केंद्र रहीं। इतवारी से महाल स्थित कोतवाली तक के मार्ग पर लाखों नागपुरवासियों ने सड़क के दोनों ओर खड़े होकर ऐतिहासिक मिरवणूक का आनंद लिया।

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मारबत जली, लेकिन बडगों की राजनीतिक आग कम दिखी

नागपुर की इस ऐतिहासिक परंपरा में मारबत के साथ बडगों के माध्यम से जनता की नाराजगी और सत्ता से सवाल सामने रखने की परंपरा रही है। इस बार उत्सव तो पूरे उत्साह से हुआ और ‘लेकर जाओ गे मारबत’ का जयघोष भी गूंजा, लेकिन सत्ता को आईना दिखाने वाली बडगों की धार पहले की तुलना में कम दिखाई दी। ऐसे में सवाल यही है कि जनता की आवाज इस बार आखिर बडगों से क्यों गायब रही?

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