केवल दिखावे के लिए किए गए इंटरव्यू
नागपुर। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख नज़दीक आते ही नागपुर जिले में राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं। टिकट को लेकर असंतोष, बगावत और जोड़-तोड़ की राजनीति इस कदर हावी रही कि कई राजनीतिक दल एबी फॉर्म लेकर संभावित उम्मीदवारों की तलाश में दिनभर घूमते नज़र आए। कहीं फॉर्म स्वीकार किए गए तो कहीं दावेदारों ने साफ़ इनकार कर दिया।
नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि से एक दिन पहले तक अधिकांश पार्टियों में स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई थी। कई दलों ने उम्मीदवारों के इंटरव्यू तो लिए, लेकिन यह प्रक्रिया महज़ औपचारिकता बनकर रह गई। अंदरखाने पहले ही टिकट तय हो चुके थे, जबकि अन्य दावेदारों को केवल संतुष्ट करने के लिए बुलाया गया।
कई स्थानों पर ऐसे उम्मीदवार सामने आए जिन्होंने पार्टी का एबी फॉर्म लेकर अंतिम समय में नामांकन भर दिया। वहीं कुछ नेताओं ने यह समझते हुए कि पार्टी उन्हें केवल “स्टैंडबाय” के तौर पर इस्तेमाल कर रही है, फॉर्म लेने से ही इनकार कर दिया और निर्दलीय या अन्य दलों से चुनाव लड़ने का फैसला किया।
30 दिसंबर को नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि थी और दोपहर 2 बजे तक का समय निर्धारित था। जैसे-जैसे समय नज़दीक आता गया, वैसे-वैसे महायुति और महाविकास आघाड़ी के खेमों में अफरा-तफरी मच गई। दोनों गठबंधनों को अंतिम समय में उम्मीदवार तय करने में भारी मशक्कत करनी पड़ी।
सूत्रों के अनुसार, अधिकांश पार्टियों ने पहले ही “जीतने योग्य” उम्मीदवारों की सूची तैयार कर ली थी। इसके बावजूद अन्य दावेदारों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया, ताकि नाराज़गी खुलकर सामने न आए। लेकिन जब टिकट कटने की जानकारी बाहर आई, तो कई कार्यकर्ता और नेता खुलकर नाराज़ हो गए।
कांग्रेस, भाजपा, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना सहित अन्य दलों में यह स्थिति लगभग समान रही। टिकट न मिलने से नाराज़ नेताओं ने पार्टी कार्यालयों में विरोध दर्ज कराया और कुछ ने अंतिम समय तक दबाव बनाने की कोशिश की।
नाराज़ और बागी उम्मीदवारों को मनाने का प्रयास दोनों गठबंधनों—महायुति और महाविकास आघाड़ी—द्वारा किया गया। राकांपा, शिवसेना (शिंदे गुट), बसपा, एमआईएम, मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों ने अपने स्तर पर समझाइश की कोशिशें कीं। कई जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं को भी चुनाव मैदान में उतारने की रणनीति अपनाई गई।
हालांकि, कई दावेदार ऐसे भी रहे जिन्होंने पार्टी नेतृत्व की बात मानने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि टिकट वितरण में मेहनती कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई और अंतिम समय में बाहरी या प्रभावशाली चेहरों को तरजीह दी गई।
नागपुर जिले में कुछ सीटों पर अंतिम क्षणों तक यह तय नहीं हो पाया कि किसे पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार बनाया जाए। कुछ पार्टियों ने आखिरी घड़ी में अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित किए, जबकि कुछ जगहों पर एबी फॉर्म ही लेकर नेता इधर-उधर घूमते दिखाई दिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की अव्यवस्था और अंदरूनी कलह का सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है। कई सीटों पर त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय मुकाबले की स्थिति बन गई है, जिससे वोटों के बंटवारे की पूरी संभावना है।

