हाई कोर्ट की इंजीनियरिंग छात्र को राहत

“सिस्टम की देरी के लिए छात्र को सजा नहीं दी जा सकती”
सुपरन्यूमेरी सीट बनाने के निर्देश

नागपुर: इंजीनियरिंग प्रवेश प्रक्रिया में हुई प्रशासनिक देरी को लेकर Bombay High Court की नागपुर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही या देरी का दुष्परिणाम किसी छात्र को नहीं भुगतना चाहिए। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि संबंधित छात्र के लिए सुपरन्यूमेरी (अतिरिक्त) सीट बनाकर उसे इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश दिया जाए।

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याचिकाकर्ता छात्र ने शैक्षणिक वर्ष 2025 के लिए इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु आवेदन किया था। कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (CET) में प्राप्त अंकों के आधार पर छात्र को अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी से पुणे के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश मिलना था। इसके लिए छात्र ने समय पर जाति वैधता प्रमाणपत्र प्राप्त करने हेतु आवेदन किया था।

अदालत के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि कानून के अनुसार जाति वैधता समिति को 45 दिनों के भीतर प्रमाणपत्र जारी करना आवश्यक था, किंतु छात्र द्वारा दिसंबर 2023 में आवेदन किए जाने के बावजूद प्रमाणपत्र समय पर जारी नहीं हो सका। बाद में समिति ने यह कहते हुए छह माह का अतिरिक्त समय दिया कि कई मामलों में देरी हो रही है। इस प्रशासनिक देरी के कारण छात्र को तय समयसीमा में प्रमाणपत्र नहीं मिल पाया।

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प्रमाणपत्र समय पर प्रस्तुत न होने के कारण छात्र की आरक्षित श्रेणी की सीट रद्द कर दी गई और उसकी सीट को ओपन कैटेगरी में परिवर्तित कर दिया गया, जिससे छात्र को इच्छित कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल सका। इसके खिलाफ छात्र ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि छात्र ने सभी आवश्यक औपचारिकताएं समय पर पूरी की थीं और गलती पूरी तरह से प्रशासनिक व्यवस्था की थी। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि आरक्षण नीति का उद्देश्य तकनीकी या प्रक्रियागत कारणों से विफल नहीं होना चाहिए और शिक्षा का अधिकार इस तरह की लापरवाही के कारण छीना नहीं जा सकता।

कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि छात्र के लिए अतिरिक्त यानी सुपरन्यूमेरी सीट सृजित की जाए और उसे उसी कॉलेज व पाठ्यक्रम में प्रवेश दिया जाए, जिसके लिए वह मूल रूप से पात्र था। साथ ही छात्र को उसके मूल दस्तावेज और जाति वैधता प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने का अवसर देने के आदेश भी दिए गए।

इस फैसले को प्रशासनिक देरी से प्रभावित छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि सिस्टम की खामियों का बोझ छात्रों पर नहीं डाला जा सकता।

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