नागपुर: अध्ययन का तनाव, करियर की चिंता, अकेलापन और मित्रों से जुड़े सवालों को लेकर जेन-जी और जेन-अल्फा के कई युवा अब माता-पिता या दोस्तों के बजाय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से बातचीत कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि AI उनकी बात पर न तो नाराज होगा और न ही उनका मजाक उड़ाएगा। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि भावनात्मक समस्याओं के लिए AI पर अत्यधिक निर्भरता मानसिक स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
‘माता-पिता को बताया तो वे चिंता करेंगे’
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, कई युवा इस डर से अपनी परेशानियां परिवार के साथ साझा नहीं करते कि माता-पिता चिंता करेंगे, गुस्सा करेंगे या पढ़ाई का दबाव बढ़ा देंगे। वहीं दोस्तों से बात करने में उन्हें आलोचना या उपहास का डर रहता है। इसी कारण वे AI से बातचीत को आसान विकल्प मान रहे हैं।
शुरुआत पढ़ाई से, फिर व्यक्तिगत सवालों तक पहुंचती है बात
विशेषज्ञों ने एक छात्र का उदाहरण दिया, जिसे यहां ‘अथर्व’ नाम दिया गया है। दसवीं के बाद उसे करियर को लेकर असमंजस था। शुरुआत में उसने AI से पाठ्यक्रम, परीक्षा की तैयारी और अध्ययन योजना से जुड़े सवाल पूछे। कुछ समय बाद उसके सवाल अधिक व्यक्तिगत हो गए।
वह पूछने लगा कि लगातार तनाव क्यों रहता है, दोस्त उससे दूरी क्यों बना रहे हैं और अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो क्या होगा। AI से कुछ ही सेकंड में उत्तर मिलने के कारण उसे लगा कि कोई उसकी बात सुन रहा है। धीरे-धीरे वह माता-पिता और दोस्तों के बजाय AI से अधिक बातचीत करने लगा।
AI का उत्तर कभी-कभी चिंता बढ़ा सकता है
विशेषज्ञों के अनुसार, AI उपयोगकर्ता के प्रश्न के आधार पर जानकारी देता है। यदि कोई व्यक्ति पहले से नकारात्मक मानसिक स्थिति में है, तो वह नकारात्मक विषयों से संबंधित जानकारी बार-बार खोज सकता है। इससे उसकी नकारात्मक सोच और चिंता और अधिक बढ़ सकती है।
AI को मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ का विकल्प मानना खतरनाक
विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि AI द्वारा दी गई सामान्य जानकारी को अपनी व्यक्तिगत स्थिति का अंतिम निष्कर्ष मानना उचित नहीं है। खासकर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में AI के उत्तर को निदान या अंतिम सलाह समझना खतरनाक हो सकता है।
‘AI सुनता है, लेकिन स्थिति समझता ही हो, यह जरूरी नहीं’
मेयो के मनोरोग विभाग के प्रमुख डॉ. अभिषेक सोमानी के अनुसार, AI से बात करते समय बच्चों को यह भरोसा मिलता है कि सामने वाला उन्हें आंक नहीं रहा है। लेकिन AI केवल उत्तर देता है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह व्यक्ति की वास्तविक परिस्थितियों और भावनात्मक स्थिति को पूरी तरह समझता है।
बच्चों पर प्रतिबंध से ज्यादा जरूरी संवाद
डॉ. सोमानी के अनुसार, बच्चों के AI उपयोग पर केवल प्रतिबंध लगाने के बजाय माता-पिता को उनके साथ संवाद बढ़ाना चाहिए। यदि बच्चा AI से व्यक्तिगत विषयों पर बात कर रहा है, तो उसे डांटने के बजाय माता-पिता पूछ सकते हैं कि उसे वास्तव में क्या जानना था और उसे ऐसी चिंता क्यों महसूस हो रही है।
तनाव बढ़े तो विशेषज्ञ से प्रत्यक्ष बातचीत जरूरी
यदि मानसिक तनाव, चिंता या अकेलेपन का असर रोजमर्रा के जीवन पर पड़ने लगे, तो माता-पिता, परामर्शदाता या मनोरोग विशेषज्ञ से प्रत्यक्ष बातचीत करना आवश्यक है। विशेषज्ञों का कहना है कि AI का उपयोग जानकारी के लिए किया जा सकता है, लेकिन AI द्वारा दी गई जानकारी को अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए और महत्वपूर्ण जानकारी की विश्वसनीय स्रोतों से पुष्टि करनी चाहिए।

