नागपुर स्थानीय स्वराज्य संस्था MLC चुनाव को लेकर सियासी माहौल पूरी तरह गरम हो चुका है। मतदान में अब केवल तीन दिन शेष रह गए हैं, ऐसे में कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला तेज हो गया है।
जहां कांग्रेस ने चुनाव को सामाजिक मुद्दों और ओबीसी प्रतिनिधित्व की दिशा में मोड़ने की रणनीति अपनाई है, वहीं भाजपा अपने मजबूत संख्याबल और गठबंधन समर्थन के दम पर जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रही है।
कांग्रेस ने खेला ‘ओबीसी कार्ड’, भाजपा पर लगाए आरोप
कांग्रेस ने इस चुनाव में ओबीसी समुदाय को केंद्र में रखते हुए भाजपा पर तीखा हमला बोला है।
कांग्रेस के शहर अध्यक्ष प्रफुल्ल गुडधे ने कहा कि:
- भाजपा उम्मीदवार डॉ. राजीव पोतदार आरएसएस विचारधारा से जुड़े हैं
- कांग्रेस उम्मीदवार अतुल लोंढे ओबीसी वर्ग से आते हैं
- भाजपा पर जनगणना में ओबीसी कॉलम हटाने का आरोप लगाया
कांग्रेस ने ओबीसी मतदाताओं से अपील की है कि वे अतुल लोंढे के पक्ष में मतदान करें।
भाजपा के पास स्पष्ट बढ़त, 582+ वोटों का दावा
इस चुनाव में कुल 836 मतदाता हैं, जिनमें से भाजपा महायुति के पास 582 से अधिक मतों का समर्थन बताया जा रहा है।
यह आंकड़ा जीत के लिए आवश्यक बहुमत से ज्यादा है, जिससे भाजपा की स्थिति मजबूत मानी जा रही है।
मित्रपक्षों और अपक्षों को साधने में जुटी भाजपा
भाजपा सिर्फ अपने संख्याबल पर निर्भर नहीं है, बल्कि महाविकास आघाड़ी और अपक्षों के वोटों में सेंध लगाने की भी कोशिश कर रही है।
हाल ही में बुटीबोरी नगर परिषद में कांग्रेस समर्थित परिवर्तन आघाड़ी के भाजपा में शामिल होने से विपक्ष को झटका लगा है।
प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने संभाली कमान
भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण नागपुर पहुंचकर महायुति के नेताओं के साथ बैठक कर चुके हैं।
इस बैठक में शामिल प्रमुख नेता:
- कृपाल तुमाने (शिवसेना)
- किरण पांडव
- अनिल अहिरकर (राष्ट्रवादी – अजित पवार गुट)
- श्रीकांत शिवनकर
- राजाभाऊ टांकसाळे
बैठक में यह रणनीति बनाई गई कि सभी सहयोगी दलों के वोट भाजपा उम्मीदवार को ही मिलें।
विपक्ष में टूट का फायदा उठाने की कोशिश
भाजपा को उम्मीद है कि विपक्ष में हो रही आंतरिक टूट और असंतोष का फायदा उसे मिलेगा और वह बड़े अंतर से जीत दर्ज कर सकती है।
वहीं, कांग्रेस अब भी अपने नगरसेवकों की निष्ठा और समर्थन को लेकर आश्वस्त नजर आ रही है।
सामाजिक बनाम राजनीतिक ताकत की लड़ाई
नागपुर का यह MLC चुनाव अब सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि
सामाजिक प्रतिनिधित्व बनाम संख्याबल की लड़ाई बन चुका है।
अब देखना होगा कि
ओबीसी मुद्दा भारी पड़ता है या भाजपा का गणित जीत दिलाता है।

