नागपुर: महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव के नतीजों के बाद सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन में अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। विपक्षी महाविकास आघाड़ी (MVA) ने पांच में से तीन सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि महायुति केवल दो सीटें ही हासिल कर सकी। इस चुनावी नतीजे के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।
भाजपा ने अपनी चुनावी निराशा के लिए सहयोगी शिवसेना को जिम्मेदार ठहराया है। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता नवनाथ बन ने आरोप लगाया कि शिवसेना ने नागपुर और पुणे में गठबंधन के साथ अपेक्षित सहयोग नहीं किया, जिससे महायुति को नुकसान उठाना पड़ा।
शिवसेना पर गठबंधन धर्म का पालन नहीं करने का आरोप
महाराष्ट्र भाजपा के मुख्य प्रवक्ता नवनाथ बन ने गुरुवार को शिवसेना पर गठबंधन की प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि यदि शिवसेना ने भाजपा और अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) का उचित समर्थन किया होता, तो महायुति पांचों सीटों पर जीत हासिल कर सकती थी।
बन के मुताबिक, पुणे में शिवसेना ने अपने सहयोगी दलों के उम्मीदवारों का समर्थन करने के बजाय अलग राजनीतिक रणनीति अपनाई, जिससे गठबंधन के चुनावी समीकरण प्रभावित हुए।
पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र बना विवाद की मुख्य वजह
महायुति में विवाद का प्रमुख कारण पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव बताया जा रहा है। यहां शिवसेना ने अंतिम समय में भाजपा के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ निर्दलीय प्रत्याशी सचिन सनप को समर्थन दिया था।
भाजपा प्रवक्ता नवनाथ बन ने आरोप लगाया कि शिवसेना के इस कदम से गठबंधन की एकजुटता प्रभावित हुई। उन्होंने यह भी कहा कि शिवसेना को पुणे शिक्षक सीट पर अपने उम्मीदवार का समर्थन करने के बदले पुणे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा को कोई विशेष चुनावी लाभ नहीं मिला।
मंत्री अब्दुल सत्तार पर भी लगाए आरोप
भाजपा ने शिवसेना के मंत्री अब्दुल सत्तार को लेकर भी सवाल उठाए हैं। नवनाथ बन ने आरोप लगाया कि अब्दुल सत्तार ने छत्रपति संभाजीनगर निर्वाचन क्षेत्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के खिलाफ प्रचार किया था।
भाजपा का कहना है कि सहयोगी दलों के बीच इस तरह की राजनीतिक गतिविधियों से महायुति की चुनावी रणनीति कमजोर हुई।
नवनाथ बन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर शिवसेना की गठबंधन के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए और कहा कि सहयोगी दलों के उम्मीदवारों के खिलाफ काम करना गठबंधन धर्म के अनुरूप नहीं है।
भाजपा उपाध्यक्ष केशव उपाध्ये ने भी उठाए सवाल
इस विवाद में भाजपा उपाध्यक्ष केशव उपाध्ये भी शामिल हो गए हैं। उन्होंने चुनावी नतीजों की व्यापक समीक्षा करने की मांग की है।
उपाध्ये ने सवाल उठाया कि जब महायुति में तीन राजनीतिक दल शामिल हैं, तो बेहतर तालमेल और संयुक्त प्रचार के जरिए गठबंधन पांच में से अधिक सीटें क्यों नहीं जीत सका।
उनकी टिप्पणी से स्पष्ट है कि भाजपा के भीतर चुनावी प्रदर्शन और सहयोगी दलों के बीच समन्वय को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
पांच सीटों के चुनाव में MVA ने दर्ज की तीन जीत
महाराष्ट्र विधान परिषद की स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की पांच सीटों के नतीजों में महाविकास आघाड़ी ने तीन सीटों पर जीत हासिल की, जबकि महायुति को दो सीटें मिलीं।
प्रमुख नतीजे इस प्रकार रहे:
- नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र: कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहळे को हराकर अपनी सीट बरकरार रखी।
- पुणे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र: राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की हर्षदा देशमुख-जाधव ने जीत दर्ज की।
- छत्रपति संभाजीनगर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र: NCP (शरदचंद्र पवार) के प्रतापसिंह पाटील विजयी रहे।
- पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र: भाजपा के कौस्तुभ गावडे ने जीत हासिल की।
- अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र: शिवसेना के किरण सरनाईक ने बाजी मारी।
इन नतीजों में भाजपा और शिवसेना दोनों को एक-एक सीट मिली, जबकि अजित पवार के नेतृत्व वाली NCP अपना खाता नहीं खोल सकी।
महायुति के अंदर समन्वय पर उठे सवाल
चुनाव परिणामों के बाद सामने आए आरोपों ने महायुति के तीनों सहयोगी दलों के बीच चुनावी तालमेल को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भाजपा की ओर से शिवसेना पर लगाए गए आरोप केवल सीटों की हार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गठबंधन के भीतर आपसी सहयोग और चुनावी समझौते की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठा रहे हैं।
फिलहाल भाजपा की ओर से सहयोगी दलों की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वहीं, शिवसेना इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देती है और गठबंधन के भीतर इस विवाद को किस तरह सुलझाया जाता है, इस पर राजनीतिक हलकों की नजर बनी हुई है।
विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति में महायुति के भीतर मौजूद मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया है। अब देखना होगा कि भाजपा, शिवसेना और NCP इन मतभेदों को दूर कर गठबंधन की एकजुटता बनाए रखने में कितनी सफल होती हैं।

