भारत में करीब 3.6 करोड़ लोग ऑस्टियोपोरोसिस से पीड़ित; हड्डियों की कमजोरी से मामूली गिरावट में भी फ्रैक्चर का खतरा, समय पर जांच और जागरूकता जरूरी
नागपुर: उम्र बढ़ने के साथ हड्डियों का कमजोर होना आम समस्या मानी जाती है, लेकिन ऑस्टियोपोरोसिस हड्डियों को अंदर से कमजोर और खोखला कर गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। इस बीमारी के कारण मामूली गिरावट या रोजमर्रा के काम के दौरान भी हड्डियां टूट सकती हैं। विश्व ऑस्टियोपोरोसिस दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने, समय पर जांच कराने और बचाव के उपाय अपनाने की जरूरत पर जोर दिया है।
वरिष्ठ अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ. संजीव चौधरी के अनुसार, दुनिया में 50 वर्ष से अधिक उम्र की हर तीन में से एक महिला और हर पांच में से एक पुरुष को ऑस्टियोपोरोसिस से जुड़े फ्रैक्चर का खतरा रहता है। यह बीमारी केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पुरुषों के लिए भी गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन सकती है।
मेनोपॉज के बाद महिलाओं में तेजी से कमजोर होती हैं हड्डियां
महिलाओं में रजोनिवृत्ति यानी मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर तेजी से घटता है। इसके कारण हड्डियों का घनत्व कम होने और उनके कमजोर पड़ने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
पुरुषों में हड्डियों की कमजोरी आम तौर पर अपेक्षाकृत देर से शुरू होती है, लेकिन फ्रैक्चर होने पर इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, विशेष रूप से कूल्हे की हड्डी टूटने के बाद बुजुर्ग मरीजों को जटिलताओं और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।
भारत में 3.6 करोड़ लोगों को ऑस्टियोपोरोसिस
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में करीब 3.6 करोड़ लोग ऑस्टियोपोरोसिस से प्रभावित हैं। पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीयों में हड्डियों से जुड़े फ्रैक्चर 10 से 20 वर्ष पहले, यानी कई मामलों में 50 वर्ष की उम्र के आसपास ही सामने आने लगते हैं।
इंडियन सोसायटी फॉर बोन एंड मिनरल रिसर्च के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में इस बीमारी के प्रति जागरूकता का स्तर केवल 10 से 15 प्रतिशत के आसपास है। ऐसे में बीमारी की समय पर पहचान और उपचार एक बड़ी चुनौती है।
विटामिन डी की कमी और जांच सुविधाओं का अभाव
शहरी जीवनशैली में धूप में कम समय बिताने और अन्य कारणों से विटामिन डी की कमी की समस्या देखी जाती है। रिपोर्ट के अनुसार, शहरी आबादी में विटामिन डी की कमी का स्तर 70 से 100 प्रतिशत तक बताया गया है। हालांकि, यह आंकड़ा अलग-अलग समूहों और अध्ययनों के अनुसार बदल सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में हड्डियों की जांच के लिए जरूरी सुविधाओं की कमी भी चिंता का विषय है। रिपोर्ट में प्रति दस लाख आबादी पर आवश्यक 10.6 डेक्सा (DEXA) मशीनों की तुलना में केवल 0.26 मशीनें उपलब्ध होने का उल्लेख किया गया है। डेक्सा स्कैन का इस्तेमाल हड्डियों के खनिज घनत्व की जांच के लिए किया जाता है।
हिएटको परियोजना से 137 गांवों की महिलाओं की जांच
महिलाओं और पुरुषों में ऑस्टियोपोरोसिस के प्रति जागरूकता बढ़ाने तथा बीमारी का समय पर पता लगाने के लिए ‘हिएटको’ परियोजना के तहत वाहन में डिजिटल अस्पताल की सुविधा विकसित की गई है। इसमें पोर्टेबल बोन स्कैनर और टेली-कंसल्टेशन के जरिए मरीजों की जांच और परामर्श किया जाता है।
डॉ. संजीव चौधरी के अनुसार, इस पहल के तहत अब तक 137 दूरदराज के गांवों की 5,789 महिलाओं की जांच की गई है। समय पर बीमारी का पता चलने और उपचार शुरू होने के बा
द करीब 22.7 प्रतिशत मरीजों के हड्डियों के घनत्व में सुधार दर्ज किया गया।
ऑस्टियोपोरोसिस से बचाव के लिए अपनाएं ये उपाय
हड्डियों को मजबूत बनाए रखने और फ्रैक्चर का खतरा कम करने के लिए जीवनशैली में कुछ बदलाव उपयोगी हो सकते हैं।
- कैल्शियम से भरपूर आहार लें: भोजन में दूध, दही, अन्य दुग्ध उत्पाद, रागी और तिल जैसे खाद्य पदार्थ शामिल करें।
- विटामिन डी का ध्यान रखें: उचित धूप लें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से विटामिन डी की जांच कराएं।
- नियमित व्यायाम करें: अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार पैदल चलने और वजन सहन करने वाले व्यायाम अपनाएं।
- नशे से दूर रहें: धूम्रपान और अत्यधिक शराब सेवन से बचें।
- समय पर जांच कराएं: अधिक उम्र, मेनोपॉज या फ्रैक्चर के जोखिम वाले लोगों को डॉक्टर की सलाह से हड्डियों के घनत्व की जांच करानी चाहिए।
- गिरने से बचाव करें: घर में फिसलन वाली जगहों को सुरक्षित रखें और पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था करें।
समय पर पहचान से कम हो सकता है फ्रैक्चर का खतरा
ऑस्टियोपोरोसिस कई बार शुरुआती अवस्था में स्पष्ट लक्षण नहीं देता। इसलिए केवल दर्द होने पर ही जांच कराने के बजाय जोखिम वाले लोगों को समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, उचित जांच और समय पर उपचार हड्डियों को स्वस्थ रखने तथा गंभीर फ्रैक्चर के खतरे को कम करने में मदद कर सकते हैं।

