युद्ध का प्लास्टिक उद्योग पर बड़ा असर; 4 हजार लघु-मध्यम उद्योगों पर संकट

पॉलिमर की कीमतों में भारी उछाल, गैस की कमी से विदर्भ के 3 हजार करोड़ के कारोबार पर खतरा मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध का असर अब विदर्भ के औद्योगिक क्षेत्र पर साफ दिखाई देने लगा है। गैस सिलेंडर की आपूर्ति बाधित होने और कच्चे माल (पॉलिमर) की कीमतों में तेज वृद्धि के कारण विदर्भ के 4 हजार से अधिक लघु और मध्यम प्लास्टिक उद्योग गंभीर संकट में फंस गए हैं।

इनमें सबसे अधिक उद्योग नागपुर जिले के बुटीबोरी और हिंगणा एमआईडीसी क्षेत्र में स्थित हैं। यदि जल्द स्थिति सामान्य नहीं हुई तो हजारों मजदूरों के सामने बेरोजगारी का खतरा पैदा हो सकता है।

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सिर्फ 3 से 4 दिन का गैस स्टॉक बचा

विदर्भ प्लास्टिक इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश खुराणा के अनुसार इस संकट का असर 3 हजार करोड़ रुपये से अधिक के कारोबार पर पड़ सकता है।

प्लास्टिक उद्योग में रीमोल्डिंग प्रक्रिया के लिए गैस का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से गैस की आपूर्ति बाधित होने के कारण कई कारखानों में सिर्फ 3 से 4 दिन का ही गैस स्टॉक बचा है।

इसके अलावा देश की बड़ी कंपनियों में भी गैस की कमी के कारण पॉलिमर का उत्पादन घट गया है, जिससे कच्चे माल की भारी कमी महसूस हो रही है।

दोहरा संकट: महंगी बिजली और कच्चे माल की बढ़ती कीमत

एक ओर कच्चे माल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर बिजली का दर बढ़कर लगभग 12 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच गया है।

उद्योग जगत के अनुसार युद्ध को अभी केवल 5-6 दिन हुए हैं, लेकिन यदि यही स्थिति अगले 15 दिन तक जारी रहती है, तो विदर्भ के लगभग 75 प्रतिशत प्लास्टिक कारखाने स्थायी रूप से बंद हो सकते हैं।

इसका असर केवल प्लास्टिक उद्योग पर ही नहीं बल्कि पेंट, टायर और अन्य संबंधित उद्योगों पर भी पड़ने की आशंका है।

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पॉलिमर की कालाबाजारी और तेज दरवृद्धि

  1. प्लास्टिक उत्पाद बनाने में इस्तेमाल होने वाले पॉलिमर की कीमतों में कुछ ही दिनों में भारी उछाल आया है।
  2. एक सप्ताह पहले इसका भाव 90 रुपये प्रति किलो था, जो बढ़कर पहले 130 रुपये और अब लगभग 150 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है।
  3. उद्योगों का दावा है कि कालाबाजार में यही पॉलिमर 160 रुपये प्रति किलो तक बेचा जा रहा है।
  4. बढ़ती कीमतों के कारण करीब 50 प्रतिशत उद्योगों ने उत्पादन घटा दिया है, जबकि कुछ उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं।

सरकार की तैयारी पर उठे सवाल

उद्योग जगत के कुछ प्रतिनिधियों का कहना है कि युद्ध की संभावना और उसके आर्थिक प्रभाव का अनुमान सरकार को पहले ही होना चाहिए था।

यदि समय रहते सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने और कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उपाय किए जाते, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती।

मौजूदा हालात में बड़े उद्योग किसी तरह टिक सकते हैं, लेकिन पूंजी की कमी से जूझ रहे लघु और मध्यम उद्योगों के लिए यह संकट विनाशकारी साबित हो सकता है।

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