सोशल मीडिया की खामोशी — जब सब बोल रहे हैं, लेकिन कोई सुन नहीं रहा

आज का दौर बोलने का है।
हर किसी के पास कहने को कुछ है, दिखाने को बहुत कुछ है।
लेकिन इसी शोर के बीच एक अजीब-सी खामोशी भी जन्म ले चुकी है — सोशल मीडिया की खामोशी

यह वह खामोशी है जिसमें लाखों पोस्ट हैं, लेकिन गहराई नहीं।
हज़ारों कमेंट हैं, लेकिन समझ नहीं।

📱 आवाज़ों की भीड़

सोशल मीडिया ने हमें मंच दिया — यह सच है।
लेकिन इस मंच पर अब हर कोई बोल रहा है, सुनने वाला कम होता जा रहा है।

हम पोस्ट करते हैं:

  • अपनी राय
  • अपना गुस्सा
  • अपनी खुशी
  • अपना दुख

लेकिन क्या हम वाकई किसी और की बात सुनते हैं?

💬 कमेंट संस्कृति की सच्चाई

कमेंट सेक्शन आज संवाद का नहीं, प्रतिक्रिया का मैदान बन चुका है।
लोग पढ़ने से पहले जवाब देने को तैयार रहते हैं।
असहमति अब चर्चा नहीं, लड़ाई बन गई है।

यह बदलाव धीरे-धीरे हमारे असली जीवन में भी उतर रहा है।

🧠 मानसिक थकान और डिजिटल बोझ

हर दिन:

  • कुछ नया ट्रेंड
  • कुछ नया विवाद
  • कुछ नया डर

यह लगातार बहती सूचना हमारे दिमाग पर बोझ डालती है।
हम अपडेट तो रहते हैं, लेकिन थक जाते हैं

यह थकान दिखाई नहीं देती, लेकिन असर ज़रूर दिखाती है:

  • चिड़चिड़ापन
  • ध्यान की कमी
  • भावनात्मक सुन्नता
🤝 कनेक्शन या कलेक्शन?

हम कहते हैं कि सोशल मीडिया ने हमें जोड़ा है।
लेकिन सच्चाई यह है कि हम अब रिश्ते नहीं, फॉलोअर्स कलेक्ट कर रहे हैं।

एक समय था जब बात करने के लिए समय चाहिए होता था।
अब बस “Seen” काफी है।

🪞 असली समस्या क्या है?

समस्या प्लेटफॉर्म नहीं है।
समस्या यह है कि हमने:

  • सुनना छोड़ दिया
  • रुकना छोड़ दिया
  • समझना छोड़ दिया
✨ समाधान की शुरुआत
  • हर मुद्दे पर राय देना ज़रूरी नहीं
  • हर बहस जीतना ज़रूरी नहीं
  • कभी-कभी चुप रहना भी संवाद होता है

निष्कर्ष:
सोशल मीडिया पर सबसे बड़ी कमी शब्दों की नहीं, संवेदनशीलता की है।
जब हम फिर से सुनना सीखेंगे, तब यह खामोशी टूटेगी।

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