धोखे का बदला लेने के लिए बड़ी संख्या में उतारे गए उम्मीदवार
नागपुर। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अपेक्षित सीटें नहीं मिलने से नाराज़ महाविकास आघाड़ी और महायुति में शामिल सहयोगी दलों की बगावत ने इस बार चुनावी समीकरण पूरी तरह बिगाड़ दिए हैं। कांग्रेस, भाजपा और उनके सहयोगी दलों के भीतर टिकट वितरण को लेकर फैले असंतोष का असर अब खुलकर चुनाव मैदान में दिखाई दे रहा है। “धोखे का बदला” लेने के इरादे से कई दलों और नेताओं ने बड़ी संख्या में अपने-अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं, जिससे सभी प्रमुख पार्टियों के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण हो गई है।
नागपुर जिले में महायुति में शामिल शिवसेना (शिंदे गुट) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) के स्थानीय कार्यकर्ताओं में खासा असंतोष देखा जा रहा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने पिछले चुनावों में पूरी मेहनत की थी, लेकिन सीट बंटवारे के समय उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया। इसी कारण कई नेता और पदाधिकारी अब खुलकर पार्टी लाइन से अलग होकर चुनाव मैदान में उतर आए हैं।
कांग्रेस को इस चुनाव में एक ओर सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करना है, वहीं दूसरी ओर अपने ही गठबंधन सहयोगियों और बागी उम्मीदवारों से भी जूझना पड़ रहा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने जिले में लगभग 76 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। कांग्रेस और राकांपा के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर लंबे समय तक चली खींचतान का सीधा असर टिकट वितरण पर पड़ा है।
कई विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के मजबूत और पुराने दावेदारों के टिकट काटे गए, जिससे कार्यकर्ताओं में भारी नाराज़गी फैल गई। नतीजतन, कुछ नेताओं ने निर्दलीय रूप से तो कुछ ने अन्य दलों के टिकट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इससे कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगने की आशंका बढ़ गई है।
महायुति में शामिल शिवसेना (शिंदे गुट) और राकांपा (अजित पवार गुट) में भी स्थिति संतुलित नहीं दिख रही है। कई सीटों पर स्थानीय नेताओं को उम्मीद थी कि उन्हें मौका मिलेगा, लेकिन टिकट किसी और को दे दिए गए। इससे नाराज़ होकर कई नेताओं ने नामांकन भर दिया है। जानकारी के अनुसार, कुछ क्षेत्रों में शिंदे गुट को आठ सीटें मिलीं, लेकिन उनमें से कई पर पुराने कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया गया, जिससे भीतरखाने असंतोष और बढ़ गया।
नागपुर शहर और ग्रामीण इलाकों में कई सीटों पर अब तीन से चार मजबूत उम्मीदवार मैदान में हैं। इससे सीधा मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस स्थिति का सबसे अधिक लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है, क्योंकि विपक्षी वोटों का बंटवारा होने की पूरी संभावना है।
कुछ क्षेत्रों में शिवसेना और राकांपा के बागी उम्मीदवार भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं, जबकि कुछ सीटों पर कांग्रेस को सीधा नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं, भाजपा ने भी रणनीति के तहत बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को और जटिल बना दिया है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि चुनाव के अंतिम चरण तक गठबंधन दलों के बीच असंतोष दूर नहीं हुआ, तो परिणाम पूरी तरह अप्रत्याशित हो सकते हैं। सहयोगी दलों की यह बगावत न केवल गठबंधनों की एकजुटता पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि पूरे जिले का चुनावी गणित बिगाड़ने का काम भी कर रही है।
अब देखना यह होगा कि मतदाता इस अंदरूनी कलह को किस रूप में लेते हैं और किसे इसका फायदा मिलता है। इतना तय है कि इस बार नागपुर जिले का चुनाव मुकाबला बेहद दिलचस्प और कांटे का रहने वाला है।

