राजानंद कावळे (किसान नागपुर ):
कहते हैं भारत प्रगति कर रहा है — मॉल, मेट्रो, हाईवे, स्मार्ट सिटी… लेकिन क्या ये ही प्रगति का चेहरा है? अगर हाँ, तो फिर वो चेहरा कहाँ है जो खेतों में पसीना बहाता है? जो धरती माँ को सींचता है अपने लहू से — वो किसान! आज भारत चमक रहा है, पर किसान बुझ रहा है। शहरों में रोशनी है, पर गाँवों में अंधेरा पसरा है।
सरकारें वादे करती हैं “किसानों की आय दोगुनी करेंगे”, लेकिन हकीकत में किसान की मुसीबतें भी दोगुनी हो चुकी हैं।
बीज महंगा, खाद महंगी, बिजली महंगी, और फसल का दाम… वही पुराना, बेहाल !
कर्ज का बोझ इतना बढ़ गया है कि किसान अपनी जान को ही आख़िरी उपाय समझने लगा है।
योजनाएँ बनती हैं, पर लागू होने से पहले ही राजनीति की भेंट चढ़ जाती हैं। आज भारत की राजधानी में ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हैं, लेकिन गाँवों में टूटे हुए सपने बिखरे पड़े हैं। एक तरफ करोड़ों रुपये के उद्योगों को सब्सिडी दी जाती है, और दूसरी तरफ किसान को मुआवज़े के नाम पर कुछ सौ रुपये की राहत — क्या यही न्याय है?
अगर भारत को सच में “विकसित राष्ट्र” बनना है, तो चमकती सड़कों से नहीं, बल्कि खेतों की हरियाली से होगा।
किसान खुश होगा तो अन्नदाता ही नहीं, देश का भाग्यविधाता बनेगा।
आज वक्त है सोचने का —
क्या भारत की प्रगति शहरों की इमारतों में है, या फिर उस मिट्टी में है जहाँ किसान अपने सपने बोता है?
याद रखिए —
जब खेत बंजर हो जाएंगे, तो मॉल भी भूखे रह जाएंगे। अगर किसान हारा, तो देश की रगों में बहता जीवन ही सूख जाएगा।
राजानंद कावळे (शेतकरी एवं कामगार नेता)
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