नागपुर :
शीत सत्र के दौरान शहर में तेंदुओं की मौजूदगी को लेकर काफी चर्चा और अफरा-तफरी का माहौल देखने को मिला था। विशेष रूप से पारडी और भांडेवाड़ी क्षेत्र में तेंदुओं के दिखाई देने की खबरों ने लोगों में दहशत फैला दी थी। इस दौरान वन संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा को लेकर भी जोरदार बहस छिड़ी थी। हालांकि, शीत सत्र समाप्त होते ही तेंदुओं के शहर छोड़कर जंगल की ओर लौट जाने की चर्चा अब सुर्खियों में है।
शीत सत्र के दौरान तेंदुओं की मौजूदगी को लेकर विपक्ष और नागरिक संगठनों ने सरकार और वन विभाग पर सवाल उठाए थे। यह भी कहा गया कि तेंदुओं के बहाने वन संरक्षण की मांग को मजबूती से उठाने के लिए यह मुद्दा जोर-शोर से उछाला गया। मगर सत्र समाप्त होने के बाद अब शहर में तेंदुओं के दिखने की घटनाएं लगभग बंद हो गई हैं।
वन विभाग के अनुसार, पारडी और भांडेवाड़ी जैसे औद्योगिक इलाकों से सटे झाड़ीदार जंगल तेंदुओं का प्राकृतिक आवास हैं। इन्हीं क्षेत्रों से भटककर तेंदुए शहर की सीमा में आ जाते हैं। विभाग का दावा है कि शीत सत्र के दौरान कुल चार तेंदुओं की पहचान हुई थी, जिनमें से दो को पकड़कर सुरक्षित रूप से जंगल में छोड़ा गया, जबकि अन्य तेंदुए अपने आप जंगल की ओर लौट गए।
‘ढील न दे’ वन विभाग
वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि तेंदुओं को लेकर किसी भी प्रकार की ढील नहीं बरती जाएगी। शहर में तेंदुओं की मौजूदगी नागरिकों के लिए खतरा बन सकती है, इसलिए विभाग सतत निगरानी रख रहा है। यदि वन विभाग की कार्यप्रणाली में लापरवाही हुई तो तेंदुओं का शहर में आना जारी रह सकता है।
वन्यजीव संरक्षण पर जोर
नागरिकों और पर्यावरणविदों का कहना है कि झाड़ीदार जंगलों और हरित क्षेत्रों को नष्ट करने से तेंदुओं जैसे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास खत्म हो रहा है। यदि इन जंगलों का संरक्षण किया जाए तो भविष्य में मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं कम हो सकती हैं।

