नागपुर।
हाल ही में संपन्न नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों के नतीजों से स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि आगामी नागपुर महानगरपालिका (मनपा) चुनाव में कांग्रेस के सामने ‘महाविकास आघाड़ी (महाविआ)’ के रूप में ही चुनाव लड़ने का एकमात्र विकल्प बचा है।
बदले हुए राजनीतिक समीकरणों में शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस के भाजपा से सीटों की अपेक्षा न करने की स्थिति बनती दिख रही है। दूसरी ओर, नगर परिषद और नगर पंचायत चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के सामने यह स्पष्ट कर दिया है कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ मिलकर ही ‘महाविआ’ के रूप में चुनाव लड़ने के अलावा कोई ठोस विकल्प नहीं बचा है।
हालांकि इन चुनावों में कांग्रेस जिले में दूसरे स्थान पर रही, लेकिन शहर में सटे क्षेत्र—कामठी रोड, वानाडोंगरी और कामठी जैसे इलाकों में भाजपा के नगराध्यक्ष चुने जाने का असर आसपास के मनपा प्रभागों में भी दिखाई देने की संभावना है। इन परिस्थितियों में कांग्रेस के सामने इन प्रभागों में कड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
जीत सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त प्रयासों के साथ आक्रामक रणनीति अपनाने की बात कांग्रेस के कुछ नेताओं ने स्वीकार की है। महानगरपालिका चुनाव की तैयारियों के बीच आए नगर परिषद और नगर पंचायत के नतीजों ने कांग्रेस को झटका दिया है। जिले में कांग्रेस को केवल मोदहा नगर परिषद में सफलता मिली, जबकि भाजपा ने 27 में से 22 नगराध्यक्ष पद जीतकर करीब 82 प्रतिशत सफलता हासिल की।
इस मुकाबले में कांग्रेस की स्थिति कमजोर नजर आ रही है। ऐसे में मनपा चुनाव के लिए कांग्रेस को अपनी रणनीति में बड़े बदलाव करने होंगे—यह अब साफ हो गया है।
तो भाजपा को कड़ी चुनौती
ग्रामीण और शहरी मतदाताओं का रुझान भले ही अलग-अलग हो, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के पक्ष में बना माहौल शहर तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगाएगा। ऐसे में आगामी मनपा चुनाव में यदि कांग्रेस शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के साथ समन्वय बनाती है, तो भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सकती है। महाविआ के रूप में चुनाव लड़ने से यह संभव है।
नागपुर में ‘काटोल फॉर्मूला’ की चर्चा
- काटोल नगर परिषद में अनिल देशमुख ने सहयोग के साथ गठबंधन कर भाजपा को नगराध्यक्ष पद से दूर रखा।
- अब मनपा चुनाव में भी यदि यही फॉर्मूला अपनाया गया तो महाविआ को सफलता मिल सकती है, ऐसी चर्चा शुरू हो गई है।
- इसके साथ ही कांग्रेस नेताओं को गुटबाजी, आपसी विवाद और मतभेदों को किनारे रखकर एकजुट होकर चुनाव लड़ने की जरूरत होगी।
नेताओं के अनुसार, इस गठबंधन में कांग्रेस को कुछ सीटों का त्याग करना पड़ सकता है। ऐसे में उन सीटों के इच्छुक उम्मीदवारों को समझाना और बगावत रोकना कांग्रेस के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती होगी। साथ ही यह भी जरूरी होगा कि कार्यकर्ता सहयोगी दलों के उम्मीदवारों के लिए ईमानदारी से काम करें। यही जिम्मेदारी उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस की भी होगी। सभी दलों को जीत की संभावना वाली सीटों पर ध्यान केंद्रित कर आपसी सहयोग बढ़ाना होगा।

