नागपुर: पिछले कुछ दिनों में नागपुर की हवा में अचानक आई गिरावट ने शहरवासियों की चिंता बढ़ा दी है। शहर के परिवेशी वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में तेज़ गिरावट दर्ज की गई है। रविवार और सोमवार को शहर के तीन प्रमुख इलाकों — अंबाझरी, महाल और राम नगर — में सूक्ष्म कण प्रदूषण (PM2.5) के स्तर में गंभीर उछाल देखा गया।
अंबाझरी और महाल में PM2.5 का स्तर 300 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (µg/m³) से भी अधिक दर्ज किया गया, जबकि राम नगर में यह स्तर 250 µg/m³ के पार पहुंच गया। यह आंकड़े इन इलाकों में लगे कंटीन्यूअस एंबिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन (CAAQMS) द्वारा दर्ज किए गए हैं
PM2.5 बेहद सूक्ष्म कण होते हैं, जिनमें कालिख, धूल और धुएं के कण शामिल होते हैं। ये मुख्य रूप से निर्माण गतिविधियों, घरेलू या औद्योगिक कचरे को खुले में जलाने और लकड़ी के धुएं से उत्पन्न होते हैं। ये कण इतने छोटे होते हैं कि सीधे फेफड़ों के अंदर जाकर गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
सर्दी के मौसम के आगमन के साथ नागपुर की हवा और अधिक प्रदूषित हो गई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, सोमवार को नागपुर का AQI 147 दर्ज किया गया, जो रविवार को 161 था। हालांकि AQI में मामूली गिरावट आई है, लेकिन शहर की वायु गुणवत्ता अब भी ‘मध्यम (Moderate)’ श्रेणी में बनी हुई है।
इस श्रेणी में आने पर विशेष रूप से दमा, फेफड़ों और हृदय रोग से पीड़ित लोगों को सांस लेने में तकलीफ का खतरा रहता है।
प्रदूषण के बढ़ते स्तर का एक प्रमुख कारण CAAQMS स्टेशनों के आसपास लकड़ी का जलाया जाना बताया जा रहा है। वहीं नागरिकों का कहना है कि मॉनिटरिंग स्टेशनों से दूर कई इलाकों में प्रदूषण का स्तर इससे भी अधिक है, जहां ठंड से बचने के लिए जगह-जगह अलाव जलाए जा रहे हैं।
रविवार शाम को शहर के कई हिस्सों में धुएं के घने गुबार देखे, जिससे लोगों को सांस लेने में परेशानी हुई। खुले में रहने को मजबूर लोग ठंड से बचने के लिए लकड़ी और सूखी पत्तियां जला रहे हैं। फिलहाल नागपुर में ठंड का असर बरकरार है और तापमान करीब 10 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है।
MPCB का क्या कहना है?
महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल (MPCB) की क्षेत्रीय निदेशक हेमा देशपांडे ने कहा कि पिछले एक सप्ताह से ठंड बने रहने के कारण लकड़ी जलाने की गतिविधियां बढ़ी हैं।
उन्होंने कहा,
“स्थिति का विश्लेषण किया जा रहा है और नगर निकायों से ग्रेडेड एक्शन प्लान लागू करने का आग्रह किया जाएगा। ठंड के कारण धुआं ऊपर फैलने के बजाय सीमित भौगोलिक क्षेत्रों में ही जमा हो रहा है, जिससे प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है।”
हवा की गुणवत्ता में आई इस अचानक गिरावट का असर अब जनस्वास्थ्य पर भी दिखने लगा है। इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव बच्चों और बुज़ुर्गों पर पड़ रहा है।
डॉक्टरों की चेतावनी
बाल रोग विशेषज्ञ एवं फेफड़ों के रोगों के विशेषज्ञ डॉ. विवेक चर्डे ने बताया कि वायु प्रदूषण से एलर्जी संबंधी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ता है।
उन्होंने कहा,
“NO₂, SO₂, ओज़ोन और अन्य कणीय प्रदूषक निचले श्वसन मार्ग तक पहुंचकर सूजन और नुकसान पहुंचाते हैं। इससे दमा, COPD, एलर्जिक राइनाइटिस और अन्य पुरानी सांस संबंधी बीमारियां और गंभीर हो जाती हैं।”
डॉ. चर्डे के अनुसार, प्रदूषण का असर केवल सांस तक सीमित नहीं रहता।
“यह आंखों और त्वचा को भी प्रभावित करता है, जिससे एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस, एक्ज़िमा जैसी समस्याएं और उनकी जटिलताएं बढ़ती हैं,” उन्होंने कहा।
गर्भ में पल रहे बच्चों पर भी खतरा
डॉ. चार्डे ने यह भी चेतावनी दी कि वायु प्रदूषण अजन्मे बच्चों के लिए भी खतरनाक हो सकता है।
उन्होंने बताया,
“प्रदूषक तत्व प्लेसेंटा के माध्यम से भ्रूण तक पहुंच सकते हैं और जन्म से पहले ही सूजन संबंधी बदलाव पैदा कर सकते हैं। बच्चों में प्रतिरक्षा तंत्र पूरी तरह विकसित नहीं होता, जबकि बुज़ुर्ग लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहते हैं। इसी वजह से बच्चों में लंबे समय तक रहने वाली एलर्जी और बुज़ुर्गों में पहले से मौजूद बीमारियों की स्थिति और बिगड़ जाती है।”
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा हालात में लोगों को खुले में अलाव जलाने से बचना, मास्क का उपयोग करना और बच्चों व बुज़ुर्गों को अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से रोकना चाहिए, ताकि प्रदूषण के दुष्प्रभावों से बचा जा सके।

