नागपुर:
महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय परिसर में रविवार को एक बार फिर सियासी हलचल देखने को मिली, जब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने रेशीमबाग स्थित स्मृति मंदिर का दौरा किया। इस दौरान दोनों नेताओं ने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरुजी) को श्रद्धांजलि अर्पित की। हालांकि, इस अवसर पर राज्य के दूसरे उपमुख्यमंत्री अजित पवार की अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया।
स्मृति मंदिर का यह दौरा ऐसे समय हुआ है, जब नागपुर में महाराष्ट्र विधानसभा का शीतकालीन सत्र चल रहा है और राज्य की राजनीति से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा हो रही है। हर वर्ष शीतकालीन सत्र के दौरान सत्ताधारी दलों के प्रमुख नेता स्मृति मंदिर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिसे राजनीतिक और वैचारिक दृष्टि से भी अहम माना जाता है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे सुबह स्मृति मंदिर पहुंचे। वहां उन्होंने डॉ. हेडगेवार और गुरुजी की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित की और कुछ समय मौन धारण कर श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम सादगीपूर्ण रहा और इसमें सीमित संख्या में नेता एवं अधिकारी मौजूद थे। दौरे के दौरान संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों से भी शिष्टाचार मुलाकात हुई, हालांकि किसी औपचारिक राजनीतिक चर्चा की जानकारी सामने नहीं आई।
मुख्यमंत्री फडणवीस, जो स्वयं नागपुर से आते हैं, संघ से वैचारिक रूप से जुड़े माने जाते हैं। उनके लिए स्मृति मंदिर का दौरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रतीक भी माना जाता है। वहीं, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की मौजूदगी को भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि शिवसेना (शिंदे गुट) और भाजपा की मौजूदा सरकार को लेकर राजनीतिक समीकरणों पर लगातार नजर रखी जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक चर्चा का विषय रहा — उपमुख्यमंत्री अजित पवार का स्मृति मंदिर दौरे में शामिल न होना। अजित पवार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता हैं और वे महायुति सरकार का हिस्सा हैं। हालांकि, वे इस दौरे में क्यों शामिल नहीं हुए, इस पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अजित पवार की अनुपस्थिति कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी वे कई मौकों पर स्मृति मंदिर के दौरे से दूरी बनाए रखते आए हैं। एनसीपी की वैचारिक पृष्ठभूमि कांग्रेस से जुड़ी रही है, और पार्टी का संघ से सीधा वैचारिक संबंध नहीं माना जाता। ऐसे में अजित पवार की गैरहाजिरी को इसी वैचारिक दूरी से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि, विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर तंज कसना शुरू कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि सरकार के भीतर ही वैचारिक मतभेद साफ दिखाई दे रहे हैं। वहीं, सत्ताधारी दल के नेताओं का कहना है कि इसे अनावश्यक राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए और यह पूरी तरह व्यक्तिगत और वैचारिक पसंद का विषय है।
फडणवीस, शिंदे और अजित पवार — तीनों नेताओं की सरकार को महायुति सरकार कहा जाता है, जिसमें भाजपा, शिवसेना (शिंदे गुट) और एनसीपी (अजित पवार गुट) शामिल हैं। यह गठबंधन राजनीतिक मजबूरियों और समीकरणों पर आधारित है, जिसमें वैचारिक विविधता भी साफ दिखाई देती है। स्मृति मंदिर दौरे के दौरान यह विविधता एक बार फिर चर्चा में आ गई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में जब स्थानीय निकाय चुनाव और अन्य महत्वपूर्ण फैसले सामने आएंगे, तब इस तरह के प्रतीकात्मक घटनाक्रमों को और गहराई से देखा जाएगा। स्मृति मंदिर दौरा केवल श्रद्धांजलि का कार्यक्रम नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में वैचारिक संकेत देने वाला कदम भी माना जाता है।
मुख्यमंत्री फडणवीस और उपमुख्यमंत्री शिंदे का स्मृति मंदिर दौरा भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के कोर समर्थकों के लिए एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है। वहीं, अजित पवार की अनुपस्थिति यह भी दर्शाती है कि गठबंधन के भीतर रहते हुए भी सभी दल अपनी-अपनी वैचारिक पहचान बनाए हुए हैं।
कुल मिलाकर, स्मृति मंदिर दौरे ने भले ही औपचारिक रूप से श्रद्धांजलि का रूप लिया हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने दूरगामी माने जा रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि महायुति सरकार इस वैचारिक संतुलन को कैसे साधती है और इसका असर राज्य की राजनीति पर किस रूप में दिखाई देता है।

