नागपुर: महात्मा ज्योतिबा फुले जनआरोग्य योजना के तहत सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों में हर साल हजारों सर्जरी की जाती हैं। इस योजना के अंतर्गत सर्जरी के बाद बीमा कंपनी से मिलने वाली कुल रकम में से 20% राशि डॉक्टरों, नर्सों और अन्य अस्पताल कर्मचारियों को प्रोत्साहन भत्ता के रूप में देने का निर्णय 2018 में राज्य मंत्रिमंडल ने मंजूर किया था। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि छह वर्ष बीत जाने के बाद भी नागपुर के शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय एवं रुग्णालय (मेडिकल), मेयो और सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल समेत राज्य के किसी भी सरकारी मेडिकल कॉलेज में यह निर्णय लागू ही नहीं किया गया।
2013 में तत्कालीन कांग्रेस–राष्ट्रवादी कांग्रेस सरकार ने गरीब और जरूरतमंद मरीजों को किफायती दरों पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए ‘राजीव गांधी जीवनदायी आरोग्य योजना’ शुरू की थी। बाद में सरकार बदलने के बाद इस योजना का नाम बदलकर ‘महात्मा ज्योतिबा फुले जनआरोग्य योजना’ कर दिया गया। इस योजना के तहत मेडिकल, मेयो और सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों में रोजाना बड़ी संख्या में शस्त्रक्रिया होती हैं और इनका दावा बीमा कंपनी से मंजूर कराया जाता है।
योजना के नियमों के अनुसार, प्रत्येक सर्जरी के लिए बीमा कंपनी द्वारा मंजूर की गई राशि का 20 प्रतिशत हिस्सा संबंधित डॉक्टरों, सर्जनों, एनेस्थेटिस्ट, फिजिशियन, मेडिकल कोऑर्डिनेटर, नर्स, सिस्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों को देना था। शुरुआत में यह व्यवस्था तीन साल के लिए प्रायोगिक तत्त्व पर लागू की जानी थी, उसके बाद हर वर्ष समीक्षा कर इसे जारी रखने का प्रावधान था। लेकिन यह व्यवस्था कागज़ों में ही सिमटकर रह गई।
नागपुर के मेडिकल, मेयो और सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में हर साल 25 करोड़ रुपये से अधिक के बीमा दावे मंजूर किए जाते हैं। यह पूरी रकम अस्पतालों के फंड में जमा हो जाती है। तय नियम के अनुसार इस 25 करोड़ में से लगभग 5 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की राशि कर्मचारियों को 20% प्रोत्साहन भत्ते के तौर पर वितरित की जानी चाहिए थी। लेकिन अब तक न तो नागपुर में और न ही राज्य के किसी भी सरकारी मेडिकल कॉलेज में यह राशि वितरित की गई।
इसका सीधा असर उन डॉक्टरों और कर्मचारियों पर पड़ रहा है जो जनआरोग्य योजना के तहत लगातार अतिरिक्त कार्यभार संभालते हुए मरीजों की बड़ी संख्या में सर्जरी करते आ रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अधीन आने वाले अस्पतालों पर भी यह नियम लागू किया जाना था, लेकिन वहां भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
स्वास्थ्यकर्मियों के अनुसार, प्रोत्साहन भत्ता न मिलने के कारण उनकी आर्थिक अपेक्षाएँ अधूरी रह गई हैं और इसके चलते असंतोष भी बढ़ रहा है। वे मांग कर रहे हैं कि सरकार तुरंत प्रभाव से 2018 के फैसले को लागू करे और बीते छह वर्षों का बकाया भी देने की प्रक्रिया शुरू करे।
प्रोत्साहन भत्ते का यह मामला अब जनआरोग्य योजना की पारदर्शिता और सरकार की उदासीनता को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। आगामी दिनों में स्वास्थ्य कर्मचारी इस मुद्दे पर आंदोलन का रास्ता भी अपना सकते हैं।

