Team Navin Awaz:
बिहार का जंगलराज…
ये सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि वो दौर था जब अपराध राजनीति के संरक्षण में पलता था, और कानून… सिर झुकाए खड़ा रहता था। यह कहानी है सीवान की, और एक परिवार की –
जिसका सब कुछ तबाह कर दिया गया… सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने अपराध के सामने सिर नहीं झुकाया
साल 2004 – सीवान
सीवान में उस वक्त लालू यादव के करीबी और आरजेडी के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन का आतंक अपने चरम पर था।
शहर का कोई कोना ऐसा नहीं था जहाँ उसका नाम सुनते ही लोग कांप न जाएं।
इसी सीवान में रहते थे एक छोटे व्यापारी – चंद्रेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू।
मुख्य बाजार में उनकी दो दुकानें थीं।
एक पर बेटा सतीश बैठता था, और दूसरी पर गिरीश।
तीसरा बेटा – राजीव, पढ़ाई करता था।
यहीं से शुरू होती है वो दिल दहला देने वाली दास्तान…
16 अगस्त 2004 – आतंक की रात
शहाबुद्दीन के गुर्गे चंदा बाबू की दुकान पर पहुँचे और बोले —
“दो लाख रुपए दो, वरना अंजाम बुरा होगा।”
सतीश ने मना किया, कहा – “हम छोटे व्यापारी हैं, इतना पैसा नहीं है।”
बस… इतना कहना ही काफी था।
गुंडों ने दुकान तोड़ दी, सारा सामान लूट लिया, और सतीश को जबरन उठा ले गए। थोड़ी देर बाद गिरीश की दुकान पर धावा बोला गया – उसे भी उठा लिया गया। फिर तीसरे बेटे राजीव को भी अगवा कर लिया गया।
तीनों भाइयों को प्रतापपुर में शहाबुद्दीन की कोठी में ले जाया गया। वहीं ईख के खेतों में शहाबुद्दीन ने अपनी “दरबार” लगाई –
और फैसला सुनाया — “तेज़ाब डाल दो इन पर।”
तेज़ाब कांड – अमानवीयता की हद
शहाबुद्दीन के आदेश पर गुर्गों ने सतीश और गिरीश पर तेज़ाब की बाल्टियाँ उड़ेल दीं। दोनों की चीखें आसमान चीर रही थीं,
धुआं उठ रहा था, बदबू फैल रही थी…
और शहाबुद्दीन हंस रहा था — जैसे किसी खौफनाक नाटक का निर्देशक हो।
दोनों की लाशों के टुकड़े कर बोरे में भर दिए गए
और खेतों में फेंक दिए गए।
राजीव को बंधक बना लिया गया —
और पिता चंदा बाबू से फिरौती मांगी गई।
भय, अपमान और बेबसी
वारदात के वक्त चंदा बाबू पटना में थे।
खबर मिली — “आपके दो बेटे मारे जा चुके हैं, तीसरा बंधक है, सीवान मत आना, वरना मार दिए जाओगे।”
राजीव किसी तरह भाग निकला।
ट्रैक्टर में छिपकर यूपी के पडरौना पहुंचा,
फिर स्थानीय सांसद के घर शरण ली।
लेकिन चंदा बाबू का परिवार बिखर चुका था — पत्नी, बेटियाँ, एक अपाहिज बेटा — सब घर छोड़ चुके थे।
न्याय की लड़ाई… लेकिन कोई सुनवाई नहीं
चंदा बाबू पुलिस अधीक्षक से मिले — मिलने नहीं दिया गया। थानेदार ने कहा – “सीवान छोड़ दीजिए वरना मारे जाएंगे।”पटना गए — वहां के नेता ने कहा, “ये सीवान का मामला है, मैं कुछ नहीं कर सकता।”
यहाँ तक कि जब वे दिल्ली पहुंचे और राहुल गांधी से मिले,
तब भी सिर्फ आश्वासन मिला — न्याय नहीं।
शहाबुद्दीन का साम्राज्य
उस वक्त बिहार में आरजेडी की सरकार थी —और शहाबुद्दीन कानून से नहीं, नेताओं से चलता था।
2005 में नीतीश कुमार की सरकार आई
तब जाकर शहाबुद्दीन की गिरफ्तारी हुई।
मामले खुले, मुकदमे चले —
लेकिन डर अभी भी कायम था।
2014 – आखिरी गवाही
चंदा बाबू के बेटे राजीव, जिसने सबकुछ देखा था,19 जून 2014 को कोर्ट में गवाही देने वाला था।लेकिन गवाही से ठीक पहले –राजीव की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
अब चंदा बाबू के तीनों बेटे मारे जा चुके थे।लेकिन शहाबुद्दीन – फिर भी जिंदा और सुरक्षित था।
न्याय की मौत
2016 में शहाबुद्दीन जेल से बाहर आया, फिर सुप्रीम कोर्ट ने उसकी जमानत रद्द कर दी। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
चंदा बाबू की जिंदगी बर्बाद हो चुकी थी वो पूरे जीवन न्याय के लिए लड़ते रहे, और दिसंबर 2020 में उनका निधन हो गया।
कुछ ही महीनों बाद —
1 मई 2021 को शहाबुद्दीन की भी मौत हो गई — कोरोना से।
और आज…
शहाबुद्दीन की पत्नी हिना और बेटा ओसामा
अब भी RJD में सक्रिय हैं।
और सवाल अब भी वही है — “क्या यही है लालू का न्याय?”
जहाँ अपराधी का साथ दिया जाता है,
और निर्दोष पिता का परिवार बर्बाद होकर भी न्याय नहीं पाता।
यह कहानी सिर्फ बिहार की नहीं,
बल्कि उस व्यवस्था की है जहाँ सत्ता अपराध के आगे नतमस्तक हो जाती है। और एक चंदा बाबू…
अपना सबकुछ खोकर सिर्फ एक सवाल छोड़ जाते हैं —
क्या कभी न्याय मिलेगा?

