विश्व मातृ दिवस पर सामने आई मां के त्याग और ममता की प्रेरणादायक कहानी
नागपुर : ‘मां’ शब्द अपने आप में प्यार, ममता और त्याग का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। जो मां अपने बच्चे को नौ महीने गर्भ में रखकर जन्म देती है, वही मां जरूरत पड़ने पर उसके जीवन को बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने से भी पीछे नहीं हटती। नागपुर के विभिन्न निजी अस्पतालों और मेडिकल से जुड़े सुपर स्पेशालिटी हॉस्पिटल के किडनी ट्रांसप्लांट सेंटर में पिछले कुछ वर्षों में मातृत्व की ऐसी ही कई भावुक और प्रेरणादायक कहानियां सामने आई हैं।
यहां अब तक 64 माताओं ने अपने बच्चों को अपनी किडनी दान कर उन्हें जिंदगी का दूसरा मौका दिया है। इन माताओं ने साबित कर दिया कि मां केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर जीवन देने वाली भी होती है।
बच्चों की जिंदगी बचाने के लिए मां की भावुक पुकार
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में युवाओं में भी किडनी फेल होने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। जब किसी मां को यह पता चलता है कि उसके बेटे या बेटी की किडनी खराब हो चुकी है, तब उसके लिए वह पल किसी सदमे से कम नहीं होता। लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी मां टूटती नहीं, बल्कि अपने बच्चे की सबसे बड़ी ताकत बनकर खड़ी हो जाती है।
“डॉक्टर, मेरी किडनी ले लीजिए लेकिन मेरे बच्चे को बचा लीजिए,” जैसी भावुक बातें डॉक्टरों को इस सेंटर में कई बार सुनने को मिली हैं। बढ़ती उम्र, ऑपरेशन का डर और भविष्य की परेशानियों की चिंता किए बिना कई माताओं ने अपने बच्चों के लिए यह बड़ा त्याग किया।
जन्म देने वाली मां ही बनी ‘जीवनदात्री’
सुपर स्पेशालिटी हॉस्पिटल के इस किडनी ट्रांसप्लांट सेंटर की शुरुआत भी एक मां के त्याग से ही हुई थी। इस सेंटर का पहला सफल ट्रांसप्लांट एक मां द्वारा अपनी बेटी को किडनी दान करने से पूरा हुआ था। तभी से यह प्रेरणादायक सिलसिला लगातार जारी है।
प्रमिला ढबाले, सुनंदा मते, शेहजाद बी अम्मी और हाल ही में 17 वर्षीय बेटे की जान बचाने वाली नीता ठाकुर जैसी माताओं ने समाज के सामने ममता और बलिदान की नई मिसाल पेश की है।
9 बेटियों और 36 बेटों को मिला नया जीवन
सुपर स्पेशालिटी हॉस्पिटल में अब तक हुए लाइव किडनी ट्रांसप्लांट में 9 माताओं ने अपनी बेटियों को, जबकि 36 माताओं ने अपने बेटों को किडनी दान कर नया जीवन दिया है। इसके अलावा निजी अस्पतालों में भी 19 माताओं ने अपने बच्चों की जान बचाने के लिए किडनी दान की है।
‘मां संकट में भगवान का रूप बन जाती है’ – डॉ. राज गजभिये
ऑर्गन ट्रांसप्लांट ऑथराइजेशन कमिटी के अध्यक्ष और अधिष्ठाता डॉ. राज गजभिये ने कहा कि, “मां केवल जन्म देने वाली नहीं होती, बल्कि कठिन समय में वह अपने बच्चे के लिए भगवान का रूप बन जाती है। अपने शरीर का एक हिस्सा देकर बच्चे को नया जीवन देना दुनिया का सबसे बड़ा त्याग है। इन माताओं ने समाज के सामने इंसानियत, प्रेम और बलिदान की सबसे बड़ी मिसाल पेश की है।”

