भारतीय रेलवे द्वारा बड़े स्तर पर कार्रवाई करते हुए करीब 3 करोड़ फेक अकाउंट्स डिलीट किए गए थे, लेकिन इसके बावजूद रेलवे टिकटों के कालाबाजार पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। आज भी आम यात्रियों को कन्फर्म टिकट मिलना मुश्किल हो रहा है, जबकि दलालों के जरिए टिकट आसानी से उपलब्ध हो रहे हैं।
रेलवे ने इस समस्या को रोकने के लिए कई सख्त कदम उठाए थे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
फेक अकाउंट्स पर बड़ी कार्रवाई
रेलवे बोर्ड ने लंबे समय से चल रहे इस घोटाले पर नजर डालते हुए देशभर में करीब 3 करोड़ फर्जी अकाउंट्स को ब्लॉक किया था, ताकि दलालों की गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके।
OTP वेरिफिकेशन सिस्टम लागू
टिकट बुकिंग प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए OTP आधारित वेरिफिकेशन अनिवार्य किया गया, जिससे फर्जी बुकिंग को रोका जा सके।
थर्ड पार्टी बुकिंग पर प्रतिबंध
रेलवे ने नियम बनाया कि थर्ड पार्टी प्लेटफॉर्म्स को तत्काल टिकट बुकिंग 30 मिनट बाद ही मिलेगी, ताकि आम यात्रियों को प्राथमिकता दी जा सके।
जमीनी स्तर पर सिस्टम फेल
इन सभी उपायों के बावजूद आम यात्रियों को कन्फर्म टिकट नहीं मिल पा रहा, जिससे रेलवे के दावे कमजोर साबित हो रहे हैं।
दलालों का बढ़ता प्रभाव
अगर यात्री अतिरिक्त पैसे देने को तैयार हैं, तो दलालों के माध्यम से उन्हें आसानी से टिकट मिल जाता है। इससे साफ है कि रेलवे सिस्टम में दलालों की पकड़ अब भी मजबूत बनी हुई है।
यात्रियों में बढ़ती नाराजगी
इस पूरी स्थिति के कारण आम यात्रियों में नाराजगी और असंतोष बढ़ता जा रहा है, क्योंकि उन्हें वैध तरीके से टिकट हासिल करना कठिन हो गया है।
इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या रेलवे की डिजिटल और प्रशासनिक सुधार योजनाएं जमीनी स्तर पर प्रभावी हैं या नहीं।

